कुलदीप प्रजापति
कैथल। आधुनिकता की चकाचौंध में तीज का त्योहार फीका पड़ता जा रहा है। लोगों न अब अपना व्यवहार बदल लिया है। आज के समय में 50 प्रतिशत लोग ही सावन में बुआ व बहन के घर जाकर कौथली देकर आते है। अब न तो पेड़ों पर झूला नजर आता है और न ही महिलाओं का समूह सावन के गीत गाता है। हर वर्ग के हाथों में मोबाइल नजर आ रहा है।
बुजुर्ग यह देखकर चिंतित नजर आ रहे है। उनका कहना है कि हमें अपनी विरासत बचाने के लिए पुरातन चलते आ रहे सभ्याचार मेलों व त्योहारों को पहले की ही भांति हंसी खुशी से मनाना फिर से शुरू करना होगा।
शहरवासी धनपति देवी, मूर्ति देवी, माया देवी, कमलेश देवी ने बताया कि कभी समय था कि जब लोग बड़ी ही बेसब्री से सावन माह का इंतजार करते थे। दुल्हनें पूरा शृंगार कर इस खुशियों के त्योहार को अपनी सखियों के साथ मनाती थी, पहले सावन माह की खुशी में ज्यादातर घरों में खीर मालपुड़े बनाए जाते थे, लेकिन अब इसकी जगह बाजार में बनी मिठाइयों ने ले ली है।
पहले के समय में पहले सावन में नई नवेली दुल्हन अपने मायके में रहती थी, लेकिन अब ये प्रचलन भी बदल गया है। महिलाओं ने बताया कि शहर क्या अब गांव में भी झूले नहीं डलते। ग्रामीण महिलाएं न तो झूले पर झूलती नजर आती हैं और न ही गीत गुनगुनाती नजर आती है। इससे पहले सावन आते ही गांव में खूब रौनक आ जाती थी। गांव के पेड़ों में और घरों में झूले डल जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होता।
बुजुर्ग कृष्णा देवी (80 वर्षीय) ने कहा कि पुराने समय में बहन और बुआ के घर कौथली जाती थी। इसमें घर के बने मालपुड़े, पताशे, घेवर व फिरनी होती थी। आज के समय में कौथली का प्रचलन बहुत कम हो गया है। लेकिन वर्तमान में भी उसका मुंहबोला भाई हरिओम पिछले 25 वर्षों से पुरानी परंपरा के अनुसार बहन भाई के हर त्योहार पर बहन के घर आता है और उनकी लंबी आयु की कामना करता है और अपने भाई का फर्ज निभा रहा है।
आज के समय में ऐस नाते बहुत कम देखने को मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज के समय में 50 प्रतिशत लोग ही सावन में बुआ व बहन के घर जाकर कौथली देकर आते है।
उन्होंने बताया कि लगभग 20 प्रतिशत लोग ऑनलाइन के माध्यम से कौथली पहुंचाने लगे हैं। शेष 30 प्रतिशत लोग कौथली को पहुंचाते ही नहीं। पहले के समय में सावन आते ही गांवों में झूले डल जाते थे। अब ऐसा नहीं होता। आज के समय में सावन तो दूर की बात तीज के दिन भी झूले नहीं पड़ते हैं। आधुनिकता की दौड़ में सब फीका पड़ गया है। संवाद
त्योहारों से दूर हो रही नई पीढ़ी ः बोहती
बुजुर्ग बोहती देवी (60 वर्षीय) ने कहा कि समय की रफ्तार इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है कि हम सभी से ऐसे खुशियों भरे त्योहार दूर होते जा रहे हैं। युवा मिलजुल कर ऐसे त्योहार मनाने के स्थान पर मोबाइल में सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय रहते हैं। उन्हें तीज त्योहार के बारे में कोई अहमियत नहीं रही। नई पीढ़ी त्योहारों से दूर होती जा रही है। इससे बुजुर्गों के दिलों की काफी ठेस पहुंची है। अब समय की मांग है कि हम अपने पुरातन चलते आ रहे सभ्याचार मेलों व त्योहार को पहले की ही भांति हंसी खुशी से मनाना फिर से शुरू करें।