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नेत्र मूंदकर बैठ जाना ध्यान नहीं : आस्था भारती

Mon, 16 Mar 2026 02:50 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
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15kht_16   कैथल के पुराने बस अड्डे पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान भजनों पर झूमते श्रद्धालु
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कैथल। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से पुराना बस स्टैंड कैथल में सात-दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा में रविवार को कथा में साध्वी आस्था भारती ने उद्धव जी की ब्रजयात्रा और रुक्मिणी-श्रीकृष्ण परिणय के प्रसंगों का वर्णन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल नेत्र मूंदकर बैठ जाना ध्यान नहीं है। ध्यान तभी सधता है जब सच्चिदानंद परमात्मा रूपी ध्येय अंतर में प्रकट हो। जैसे द्वारका पहुंचने के लिए यात्रा करनी पड़ती है, वैसे ही केवल विचार सुनने से परिवर्तन नहीं होता, मनन और जीवन में धारण करने से ही वास्तविक परिवर्तन आता है।
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साध्वी ने भगवान की अनंत लीलाओं में छिपे गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर किया। उन्होंने कहा कि आज विज्ञान अपनी चरम सीमा पर है, परंतु सुख-सुविधाओं के साधनों के बावजूद जीवन में अशांति बनी हुई है। समाज में आत्महत्या की दर बढ़ रही है। विज्ञान ने मंगल ग्रह की खोज तो कर ली, लेकिन जीवन में मंगल कैसे आए, इसका उत्तर उसके पास नहीं है। इन प्रश्नों का समाधान केवल अध्यात्म ही दे सकता है, तभी तो अध्यात्म को विज्ञानों का विज्ञान कहा गया है।
ऋषियों ने भी यही सूत्र दिया है कि पहले परमात्मा के विषय में सुनो, फिर उस पर मनन-मंथन करो, सतगुरु की शरण में जाकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त करो और निरंतर ध्यान-साधना करो। साध्वी ने बताया कि जैसे देवी रुक्मिणी ब्राह्मण की सहायता से श्रीकृष्ण से मिलीं, वैसे ही गुरु के माध्यम से ही ईश्वर का दर्शन संभव है। श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह उत्सव में श्रद्धालु भक्ति और आनंद में झूम उठे। साध्वी ने कहा कि जब गुरु कृपा से आत्मा को ईश्वर दर्शन होता है, तब जीवन का हर दिन आनंद उत्सव बन जाता है। इस मौके पर कथा के दौरान करमबीर कॉल, शाम बंसल, रमेश सचदेवा, देविंद्र सहारण आदि मौजूद रहे। संवाद
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