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नोटबंदी : जुगाड़ से चल रहा मिड डे मील

Wed, 23 Nov 2016 11:59 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, कैथल
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नोट बंदी के फैसले का सरकारी स्कूलों में दिए जाने वाले दोपहर के भोजन पर असर होने लगा है। स्कूलों में उपलब्ध पुरानी करेंसी खर्च हो चुकी है। नई करेंसी मिलने में हो रही दिक्कतों के कारण अध्यापक किसी तरह राशि या खाद्य सामग्री का जुगाड़ कर बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं। कई स्कूलों की मिड डे मील वर्कर सुबह लाइन में लगती हैं। दोपहर तक किसी तरह नकदी निकलवाकर अगले दिन के लिए जुगाड़ कर पाती हैं। जिन स्कूलों में बच्चों की संख्या ज्यादा है, वहां परेशानी और भी ज्यादा है। बता दें कि जिले में एक दिन में करीब 70 हजार बच्चों के लिए मिड डे मील बनता है। जिसके लिए सब्जी, दूध, मसालों व अन्य खर्च के लिए एक दिन में करीब तीन लाख पचास हजार रुपये नकदी की जरूरत होती है।
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मिड डे मील वर्कर्स को लगना पड़ रहा है लाइनों में
शहर के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल में खाना बनाने वाली कुक चंचल, कंचन और पुष्पा ने बताया कि मिड डे मिल के लिए सब्जी खरीदने में बहुत कठिनाइयां आ रही है। बड़े नोटों का प्रचलन बंद होने से सब्जी वालों को देेने के लिए छोटे नोट ही नहीं है। सब्जी वाले ने दो-तीन दिन तक तो उधारी में सब्जी दी। लेकिन उसके बाद उसने सब्जी देनी भी बंद कर दी। जिसके बाद अध्यापकों के सहयोग से स्कूल में मिड डे मील के लिए सब्जियां आ रही हैं। मिड डे मिल के लिए समान के लिए सप्ताह में दो से तीन दिन तक बैंकों में रुपयों के लिए लाइन में खड़ा होना पड़ता है।
प्रिंसिपल सतीश कक्कड़ ने बताया कि नोटबंदी के बाद एक सप्ताह तक तो चेक ही नहीं आया। जब चेक आया तो रुपयों के लिए मजबूरी में मिड डे मिल वर्करों को भेजा गया। इसके बावजूद भी सब्जी के लिए छोटे नोट नहीं मिल रहे। क्योंकि गांवों में करियानेवाला, सब्जीवाला या दूध विक्रेता चेक से भुगतान स्वीकार नहीं करता।
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बिगड़ रही है रेसिपी
राजकीय स्कूल नंबर 4 में नोटबंदी के कारण सप्ताह में बनने वाला खाने का शेड्यूल भी प्रभावित हुआ। जिस कारण सप्ताह में दिन के अनुसार भी बनाया जाने वाला खाना नहीं बन रहा। अधिकतर दिनों में कढ़ी-चावल और खिचड़ी ही बनाई जा रही है।

13 दिन तक अध्यापकों ने राशि एकत्रित करके चलाया काम
देवीगढ़ के राजकीय प्राथमिक स्कूल में नोटबंदी के कारण स्कूल में मिड डे लिए रुपये न आने के कारण अध्यापकों को खुद जेब से रुपये खर्च करके मिड डे मिल में खाना बनवाना पड़ रहा है। स्कूल के प्रिंसिपल शीशपाल ने बताया कि नोटबंदी होने के 8 नवंबर से लेकर 20 नवंबर तक मिड डे मिल के रुपये नहीं आए। जिस पर उन्होंने अपनी जेब से रुपये खर्च करके बच्चों के लिए खाना बनवाया। उन्होंने बताया कि उनके स्कूल में एक सप्ताह में बच्चों के अनुसार 36 हजार रुपये खर्चा आता है। लेकिन बैंकों से केवल 24 हजार रुपये निकलने के कारण मिड डे मील के लिए नकदी की भारी कमी है। उन्होंने बताया कि 8 नवंबर के बाद 20 नवंबर को उनके स्कूल के मिड डे मील के लिए रुपये आए।

स्थिति पर रखें हैं नजर
सर्व शिक्षा अभियान के इंचार्ज शमशेर सिरोही ने कहा कि नकदी की कमी के कारण परेशानी तो है। लेकिन किसी स्कूल में मिड डे मील बंद नहीं हुआ है। अध्यापक उधारी से काम चला रहे हैं। स्थिति पर नजर रखी जा रही है।

ध्यान दे सरकार
अध्यापक संघ के सचिव सतबीर गोयत का कहना है कि सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि मिड डे मील के लिए नकदी की कमी ना रहे। इसके लिए विशेष रूप से नकदी उपलब्ध करवाई जाए। ताकि अध्यापकों, मिड डे मील वर्कर्स को नकदी के लिए बैंकों में लाइन में ना लगना पड़े। खातों से 24 हजार रुपये की सीमा होने के कारण ज्यादा नकदी नहीं निकल पा रही।

बच्चों को नहीं होने देंगे परेशानी
डीईओ निर्मल तनेजा ने कहा कि अभी तक किसी स्कूल में नकदी की कमी के कारण मिड डे मील नहीं रुका है। यदि कहीं परेशानी आती है तो उसे दूर करवाते हुए कोई ना कोई उपाय किया जाएगा। बच्चों को परेशानी नहीं आने दी जाएगी।
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