संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध की जीत की खुशी में कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। यह दिवस भारतीय सशस्त्र बलों की बहादुरी, साहस और बलिदानियों को श्रद्धांजलि देने के लिए ही मनाया जाता है। इस बार 25वां कारगिल विजय दिवस मनाया जाएगा। कारगिल के युद्ध में जिले के गांव पाई निवासी फौजी रणधीर सिंह ने भी अपनी बहादुरी कारगिल में दिखाई थी। उन्होंने कारगिल युद्ध में दुश्मनों का सामना करते हुए अपनी टांग गंवा दी थी।
गौरतलब है कि 58 वर्षीय फौजी रणधीर सिंह ने 25 मई 1988 में भारतीय सेना में हवलदार के पद पर तैनात हुए थे। जिनकी पहली पोस्टिंग जम्मू कश्मीर के अखनूर में हुई थी। इसके बाद उन्हें 1999 में कारगिल युद्ध में भेजा गया। फौजी रणधीर सिंह ने बताया कि टीम को सूचना मिली थी कि उग्रवादियों भारतीय सीमा के अंदर प्रवेश कर चुके है। इसके बाद भारतीय सेना व उग्रवादियों के बीच फायरिंग हुई। जिसमें उन्होंने बहादुरी से लड़ाई लड़ी। उन्होंने बताया कि इस बीच उन्हें कई ऑपरेशन में शमिल हुए।
फौजी रणधीर सिंह ने बताया कि उनकी रिटायरमेंट 31 मई 2012 को हुई थी। जिसके बाद वह अपने गांव पाई में सादगी का जीवन रहे हैं। फौज से आने के बाद उन्होंने पाई गांव में अपना व्यापार शुरू कर दिया और गांव में ही कमीशन एजेंट बन गए। साथ बताया कि वह मार्केट कमेटी पाई के चेयरमैन भी रह चुके है। वहीं, फौजी रणधीर सिंह को 2010 में यूएनओ की सरकार ने प्रशस्ति पत्र भी दिया है।
शहीद हो गए तीन दोस्त
रणधीर सिंह ने बताया कि वर्ष 1995 में ग्लेशियर में ड्यूटी के दौरान रात के समय पांच जवान गश्त पर थे। बर्फीली हवाओं में एक-एक कदम चलना भारी था। अचानक बर्फ का पहाड़ दरक गया और उसकी आंखों के सामने तीन साथी उसमें दब गए। तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। शहीद होने वाले जवानों में भिवानी निवासी राजपाल, हिमाचल निवासी प्रेम और राजस्थान निवासी महेंद्र सिंह थे। वह और उत्तर प्रदेश निवासी राजेश बाल-बाल बच गए थे। तीनों शहीदों के शव भी करीब छह महीने के बाद मिले थे।