संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के अधीनस्थ कृषि विज्ञान केंद्र कैथल में सोमवार को फसल अवशेष प्रबंधन विषय पर पांच दिवसीय दो प्रशिक्षण कार्यक्रमों का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर गांव जसवंती और चक्कू लदाना के 25-25 किसानों ने भाग लिया और फसल अवशेषों को न जलाने की शपथ ली।
केंद्र के सस्य वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण आयोजक डॉ. अमित कुमार ने फसल अवशेषों के प्रबंधन के लाभ बताते हुए कहा िक इससे भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है। उन्होंने कहा कि इन कार्यक्रमों में फसल अवशेष प्रबंधन, भूमि स्वास्थ्य संरक्षण तथा पराली जलाने से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे विषयों पर वक्तव्य होंगे। उन्होंने कहा कि इससे न केवल भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है, बल्कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है।
डॉ. अमित कुमार ने प्रतिभागी किसानों को बताया कि जैविक कार्बन भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने का प्रमुख कारक है। भूमि में जैविक कार्बन तीन ही तरीकों से बढ़ाया जा सकता है या तो खेतों में जैविक खादों जैसे गोबर खाद, केंचुआ खाद आदि डाले, या अपने खेत में हरी खाद जैसे कैंचा, मूंग इत्यादि उगाकर भूमि में मिला दे तथा तीसरा तरीका, फसल अवशेषों का यथास्थान प्रबंधन करके खेत में मिला दे।
पराली जलाने से बिगड़ता है पर्यावरण संतुलन : डॉ. रमेश वर्मा
केंद्र के वरिष्ठ समन्वयक डॉ. रमेश वर्मा ने कहा कि फसल अवशेष प्रबंधन समय की आवश्यकता है। पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ-साथ भूमि में उपस्थित मित्र कीट और सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे जैव विविधता और फसल उत्पादन दोनों प्रभावित होते हैं। डॉ. दीपक कुमार एवं डॉ. गुरनाम सिंह ने भी अपने विचार रखे।
सरकार दे रही है अनुदान पर मशीनें : डॉ. जसबीर सिंह
केंद्र के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. जसबीर सिंह ने बताया कि किसान भाई सरकार द्वारा अनुदान पर उपलब्ध मशीनों जैसे सुपर सीडर, हैप्पी सीडर, स्मार्ट सीडर, जीरो टिलेज, मल्चर, चॉपर, रोटावेटर आदि का उपयोग करके खेत में फसल अवशेष मिला सकते हैं। बेलर और हे-रेकर जैसी मशीनें भी खेतों से बाहर फसल अवशेष प्रबंधन के लिए दी जा रही हैं।