संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल/राजौंद। हिंदू पंचांग के अनुसार अबकी पितृ पक्ष 17 सितंबर से आरंभ हो रहा है, लेकिन इस दिन श्राद्ध नहीं किया जाएगा। दरअसल, 17 को मंगलवार है। इस दिन भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध है और पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म के कार्य प्रतिपदा तिथि से किए जाते हैं। इसलिए 17 सितंबर को ऋषियों के नाम से तर्पण किया जाएगा।
गौरतलब है कि दरअसल, श्राद्ध पक्ष का आरंभ प्रतिपदा तिथि से होता है। इसलिए 18 सितंबर से पिंडदान, ब्राह्मण भोजन, तर्पण, दान आदि कार्य किए जाएंगे। ऐसे में देखा जाए तो पितृ पक्ष का आरंभ 18 सितंबर से हो रहा है और यह 2 अक्तूबर तक चलेगा।
इसी प्रकार अमावस्या का श्राद्ध दो अक्तूबर दिन बुधवार को होगा। यह जानकारी आचार्य संजय शर्मा ने दी है। उन्होंने बताया कि श्रद्धा से श्राद्ध बना है। श्रद्धापूर्वक किए गए कार्य को ही श्राद्ध कहते है। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह श्राद्ध कहलाता है।
जीवित बुजुर्गों और गुरुजनों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए उनकी अनेक प्रकार से सेवा पूजा तथा संतुष्टि की जा सकती है, परंतु पितरों के लिए श्रद्धा एवं कृतज्ञता प्रकट करने वाले को कोई निमित्त बनाना पड़ता है। यह निमित्त है श्राद्ध।
उन्होंने कहा कि गीता के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान उपदेश करते हुए कहा कि पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।। हे अर्जुन जो व्यक्ति मुझे श्रद्धा से पत्र, पुष्प, फल, जल श्रद्धा से अर्पित करता है, उस श्रद्धा से दिए गए भोग को मैं भोजन के रूप में ग्रहण करता हुं। धर्म व कर्म सभी श्रद्धा का विषय हैं।
उन्होंने बताया कि इस विषय को समझते हुए प्रत्येक मनुष्य को धर्म व कर्म करना चाहिए, लेकिन कलियुग में धर्म की अनित्यता के कारण प्राय ये विधान लुप्त होते जा रहे हैं। कर्मकांड भी प्राय लुप्त हो रहा है। हम अपने दिवंगत पूर्वजों को इन दिनों श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। अर्थात उन आत्माओं के प्रति आदर भाव प्रकट करना या उनको याद करना ही श्राद्ध है। वेद में कहा गया है कि मातृ देवों भव, पितृ देवों भव, आचार्य देवों भव, अतिथि देवों भव। इन चारों पदों मेें हमारी भारतीय संस्कृति का महत्व है, जिसके पास ये चारों पदार्थ हैं वही गृहस्थ सुखी और परमानंदित है।
उन्होंने बताया कि प्रथम पद में माता पहला गुरु है, दूसरे पद में पिता गुरु है, तृतीय पद में आचार्य- जो समाज में अच्छे चरित्र का निर्माण करे वह गुरु है, चतुर्थ पद में अतिथि वो है जिसके आने की कोई तिथि नही है अर्थात जो अपरिचित है, दरवाजे पर भोजन की इच्छा लिए हुए आगंतुक अपरिचित व्यक्ति को भोजन करवाना श्रेष्ठ कहा है। इन चारों की आदर भाव से सेवा करना हिंदू संस्कृति है। जीवित माता-पिता एवं गुरुजनों की सेवा करना तथा दिवंगत होने पर उनके प्रति सच्ची श्रद्धा ही श्राद्ध है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या पर्यंत श्राद्ध पक्ष या महालय पक्ष कहलाता है।
n17 सितंबर मंगलवार पूर्णिमा का श्राद्ध (ऋषियों के नाम से तर्पण)
n18 सितंबर बुधवार प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध (पितृपक्ष आरंभ)
n19 सितंबर गुरुवार द्वितीया तिथि का श्राद्ध
n20 सितंबर शुक्रवार तृतीया तिथि का श्राद्ध
n21 सितंबर शनिवार चतुर्थी तिथि का श्राद्ध
n22 सितंबर शनिवार पंचमी तिथि का श्राद्ध
n23 सितंबर सोमवार षष्ठी, सप्तमी तिथि का श्राद्ध
n24 सितंबर मंगलवार अष्टमी तिथि का श्राद्ध
n25 सितंबर बुधवार नवमी तिथि का श्राद्ध
n26 सितंबर गुरुवार दशमी तिथि का श्राद्ध
n27 सितंबर शुक्रवार एकादशी तिथि का श्राद्ध
n29 सितंबर रविवार द्वादशी तिथि का श्राद्ध
n30 सितंबर सोमवार त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध
n1 अक्तूबर मंगलवार चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध
n2 अक्तूबर बुधवार सर्व पितृ अमावस्या (समापन)
श्राद्ध करने का सबसे उत्तम समय
शास्त्रों के अनुसार, पितृ पक्ष में सुबह और शाम के समय देवी देवताओं की पूजा को शुभ बताया गया है। साथ ही पितरों की पूजा के लिए दोपहर का समय होता है। वहीं पितरों की पूजा के लिए सबसे उत्तम समय 11.30 से 12.30 बजे तक बताया गया है। इसलिए आपको पंचांग में अभिजीत मुहूर्त देखने के बाद ही श्राद्ध कर्म करें।