बच्चों के स्कूली सफर को सुरक्षित बनाए जाने के तमाम निर्णय धरातल पर लागू होते नजर नहीं आ रहे हैं। स्कूल वाहनों में बच्चों को ठूंस-ठूंस कर ले जाया जाता है।
बार-बार सख्ती के बावजूद नियमों के पालन के नाम पर किराया बढ़ाकर अभिभावकों की जेब पर तो भार बढ़ा दिया जाता है, लेकिन बाद में इन वाहनों में बच्चों की संख्या उसी स्तर पर पहुंच जाती है। जिस कारण बच्चों को लटकते हुए घर से स्कूल एवं स्कूल से घर तक का सफर तय करना पड़ता है। बच्चों की सुरक्षा के लिए गठित स्कूल सुरक्षा समिति भी निष्क्रिय साबित होती नजर आ रही है।
जिला प्रशासन द्वारा करीब दो वर्ष पहले अंबाला में स्कूल बस के हुई कई बच्चों की मौत के बाद ऑटो चालकों को छह विद्यार्थी बैठाने के आदेश जारी किए थे। इस निर्णय के बाद ऑटो चालकों का किराया 350 से बढ़ाकर 500 रुपये कर दिया गया था। इस निर्णय से अभिभावकों की जेब पर तो भार बढ़ गया। लेकिन अब इन वाहनों में संख्या तय संख्या से कई गुणा तक ज्यादा पहुंच गई है। जिसकी कोई निगरानी नहीं हो पा रही है।
शहर में ऑटो चालक ऑटो 12 से 15 बच्चे तक सवार किए हुए नजर आते हैं। अभिभावकों का कहना है कि जिला प्रशासन ने अभिभावकों पर किराये का बोझ तो डाल दिया। लेकिन जो नियम ऑटो चालकों के लिए बनाया गया था उसकी उल्लंघन पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। दर्जनों बच्चें एक-एक ऑटो पर लटक-लटक कर स्कूलों तक जा रहे है।
अभिभावकों पर पड़ा किराये का अधिक बोझ
बच्चों की अभिभावक विनय कुमार गुलाटी, अशोक कुमार, सतबीर सिंह, जितेन्द्र कुमार पुरी, ओपी सैनी, सतीश कुमार, मनोज कुमार, कमल गुप्ता ने बताया कि जिला प्रशासन ने ऑटो चालकों को कम विद्यार्थी उठाने के लिए आदेश पर किराया तो 350 से 500 रुपये कर दिया। लेकिन ऑटो चालकों पर जारी आदेशों को पालन नहीं हुआ। जिसके परिणाम स्वरूप ऑटो चालक अब बच्चों की संख्या 12 से 15 तक एक समय में उठा रहे हैं। जिस ओर जिला प्रशासन कोई ध्यान नहीं दे रहा है। बच्चों की जान को हर समय खतरा बना रहता है।
ऑटो में विद्यार्थियों की संख्या निश्चत होती है। उनके संज्ञान में यह मामला नहीं था। ऑटो में बच्चों की संख्या की जांच होगी, अगर कोई ऑटो चालक अधिक संख्या में बच्चों को लेकर जाता है। उनके खिलाफ कार्रवाई होगी।
-शमशेर सिंह, जिला यातायात इंचार्ज।