संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। गुरु पूर्णिमा का पर्व रविवार को मनाया जाएगा। गुरु का जीवन में काफी महत्व होता है। गुरुओं के सम्मान से ही सफलता मिलती है। यदि इनका मार्गदर्शन न हो तो सफलता का रास्ता भी नहीं मिल पाता है। इसलिए गुरु भी चाहते हैं कि उनका शिष्य सफल हो। उनकी सफलता से ही गुरु की मेहनत सार्थक होती है।
सफल शिष्य ही गुरु की खुशी होता है। गुरु पूर्णिमा काे लेकर एसपी, डीईओ सहित अन्य अधिकारियों से की बातचीत की। इन का भी कहना कि गुरु के बिना कोई गति नहीं है। एक नेक और अच्छा रास्ता दिखाने के लिए गुरु का जीवन में उतना ही महत्व होता है। जितना माता-पिता का। गुरु रास्ता दिखाता है तो सफलता निश्चित मिलती है।
ऊंचा होता है गुरु का दर्जा
मेरे पिता प्रो. के सनसनवाल जो एक कॉलेज में प्राध्यापक रहे व बड़े भाई अजय सनसनवाल व बड़ी बहन राजरानी भी प्राध्यापक रही हैं। उनके परिवार में सभी सदस्य शिक्षा विभाग में रहे हैं। सबसे पहले तो मेरे पिता मेरे प्रेरणास्रोत रहें हैं। उनसे मैंने ये सीखा की एक अध्यापक बहुत कुछ परिवर्तन ला सकता है। इसके लिए हमें अपने कार्य क्षेत्र में समर्पित होना चाहिए। मेरे गणित के एक शिक्षक थे जो चौ. देवी सिंह जो जाट हाई स्कूल में शिक्षक थे, वे मुझ पर बहुत विश्वास करते थे और वे जो भी मुझे मुश्किल से मुश्किल कार्य देते थे तो उसे बड़ी आसानी से कर देती थी। गुरु से यही गुरुमंत्र मिला कि सबसे पहले अपने आप में आत्म विश्वास होना चाहिए। - विजय लक्ष्मी, जिला शिक्षा अधिकारी, कैथल।
गुरु की पिटाई के कारण ही आज जिला खेल अधिकारी
मैंने बचपन से गांव नडरावन जिला झज्जर में पहलवानी का अभ्यास किया व फिर दिल्ली चला आया। मेरे गुरु अर्जुन अवार्डी संजय पहलवान से अखाड़े में पहलवानी के गुर सीखे। उनका गुरु मंत्र ये ही था-अखाड़े में मेहनत व लगन से पहलवानी करो।
मेरे गुरु हमेशा कहते थे कि खेल में गोल बनाकर उस पर कड़ी मेहनत करो और खेल को ज्यादा से ज्यादा सीखने की कोशिश करो। मेरे गुरु के साथ बीते वे पल मैं हमेशा याद रखूंगा। एक बार मैं उन्हें बिना बताए अखाडे़ से घर चला गया था तो उन्होंने मेरी पिटाई की। मेरे पिताजी को बुलाकर कहा कि अब ये कभी घर नहीं जाएगा। अब ये यहीं पर पहलवानी करेगा। आज मैं सफलता के मुकाम पर पहुंच कर जिला खेल अधिकारी बना हूं। मैं सभी खिलाड़ियों को यही संदेश देता हूं हमेशा मेहनत करें व आगे बढ़ें।
-डॉ. देवेंद्र कुमार, जिला खेल अधिकारी
जीवन संवारने में गुरुओं का योगदान
मेरे जीवन को संवारने में मेरे गुरुओं का काफी योगदान रहा है। आज उन्हीं की शिक्षा की बदौलत मैं एक आईपीएस अधिकारी हूं। मेरे माता-पिता भी पेशे से शिक्षक हैं। 10वीं कक्षा तक की पढ़ाई मैंने उन्हीं के पास गांव के स्कूल में की है। उसके बाद उच्च स्तरीय शिक्षा में भी गुरुओं ने ही सहायता की। गुरुओं का सम्मान करने से ही सफलता मिलती है। -उपासना, एसपी, कैथल।