संवाद न्यूज एजेंसी
कलायत। अपने माखनचोर को हर सुबह पूरी तरह से तैयार करना जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। विवाह से पूर्व अपने घर से दूर रह कर पढ़ाई करती रही। तीन वर्ष पूर्व विवाह के उपरांत ससुराल में आते ही कृष्णमय वातावरण मिला। घर में ठाकुर जी की प्राण प्रतिष्ठा पहले से ही है। पूजा उपासना से दूर रहने वाली को यह माहौल इतना पसंद आया की पूरी तरह से उसी में रम कर रह गई। अब महसूस होता है कि मैं जीवन के इतने समय तक कान्हा से इतना दूर क्यों रही। मेरे घर में जिन कान्हा जी की प्राण प्रतिष्ठा है उन्हें घर में कनुआ के नाम से पुकारा जाता है। पर मैं अपने कान्हा को माखनचोर के नाम से बुलाती हूं। सुबह उनका स्नान, वस्त्र बदलना और भोग होने के बाद ही रसोई घर में जाना होता है। सायं के समय अपने घर की छत पर अपने माखनचोर को घुमाना और रात्रि भोग के बाद उनका शयन करवाना कभी नहीं भूलती।