फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

महंगी लेबर से मिलर्स की हालत खराब

Mon, 23 Nov 2015 12:04 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला/कैथ्ाल
विज्ञापन
विज्ञापन
राइस इंडस्ट्री लगातार महंगी होती जा रही लेबर से परेशान है। इंडस्ट्री में धान से चावल निकालने के लिए सरकार द्वारा केवल 15 रुपये प्रति क्विंटल की राशि दी जाती है जबकि मिलर्स का 180 रुपये के आसपास प्रति क्विंटल पर खर्च आता है। हालांकि इसमें मिलर्स को पॉलिश एवं छिलका भी बचता है लेकिन इससे उनका खर्च पूरा नहीं हो पाता। बार-बार की जा रही मांग के बावजूद मिलर्स को मिलिंग दरों बढ़ाकर नहीं दी जा रही हैं।
विज्ञापन


35 रुपये से बढ़कर 180 रुपये हुआ खर्च
धान मिलिंग का खर्च शुरुआती समय में करीब 35 रुपये प्रति क्विंटल था। इसमें मजदूरी सहित मशीनी खर्च भी शामिल था लेकिन आज यह बढ़कर 180 रुपये प्रति क्विंटल जा पहुंचा है। जिस कारण मिलर्स लगातार नुकसान की बात कह रहे हैं।

कई तरह की लेबर के कारण आता है ज्यादा खर्च
मिलर्स से मिली जानकारी के अनुसार मिलर्स को सबसे पहले अनाज मंडी से धान की लोडिंग का खर्च देना पड़ता है। इसके बाद मिल तक किराया, अपने राइस मिल में अनलोडिंग, धान को सुखाने इसके बाद मिल में लगाने तथा बाद में मिल से चावल की छंटनी एवं छंटनी के बाद पैकिंग एवं पैकिंग के बाद ट्रकों में लोडिंग में मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है।
विज्ञापन


राइस मिलर प्रो. राजकुमार गर्ग का कहना है कि मिलिंग में मजदूरी की दरों में कई गुणा बढ़ोतरी हो गई है जिस कारण मिलर्स लगातार नुकसान में हैं। इस नुकसान की भरपाई के लिए कोई सहयोग नहीं मिल रहा है। सरकार को चाहिए कि मिलिंग की दरों में बढ़ोतरी करें।

मिलर अनिल गोयल का कहना है कि लेबर महंगी तो हो ही गई। मजदूर मिलते ही नहीं। बिहार से आने वाले मजदूर कई बार कम आते हैं। स्थानीय स्तर पर इतने मजदूर नहीं मिल पाते। जिस कारण कई बार इससे भी ज्यादा दरों पर लेबर हायर करनी पड़ती है। सरकार को इन समस्याओं की ओर भी ध्यान देना चाहिए।

राइस मिलर्स एसोसिएशन के पूर्व प्रधान संजय गर्ग का कहना है कि मिलिंग का कार्य लगातार महंगा होता जा रहा है। जबकि मिलर्स की आय में कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही। खर्च एवं आय में लगातार बढ़ रहे अंतर के कारण मिलिंग इंडस्ट्री संकट में हैं। मिलिंग के लिए 40 साल से केवल 15 रुपये प्रति क्विंटल की दर से मिलिंग खर्च मिलता है। जो आज के समय को देखते हुए काफी कम है। इसमें कम से कम 100 रुपये की बढ़ोतरी की आवश्यकता है। वैसे मिलर्स की मांग 200 रुपये प्रति क्विंटल किए जाने की है।

राइस मिलर्स एसोसिएशन के अनुसार भले ही मिलर्स को पॉलिस एवं छिलका की बचत होती है लेकिन यह इतनी नहीं होती कि आज के सभी प्रकार के खर्च निकाल कर कुछ बचत हो सके। इसीलिए सरकार को मिलिंग की राशि बढ़ानी चाहिए।
विज्ञापन


विशेष पैकेज दे सरकार
राइस मिलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मांगेराम खुरानिया का कहना है कि सरकार मिलर्स को विशेष राहत पैकेज दे। तभी जाकर इंडस्ट्री समस्याओं से निपट सकती है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें