कैथल। अपराजिता यानी जिसे पराजित न किया जा सके। अपने नाम को सच साबित किया मूल रूप से बनारस (वाराणसी) निवासी और वर्तमान में कैथल की उपायुक्त अपराजिता शर्मा ने। वह दो बार यूपीएससी परीक्षा में असफल रहीं। असफलताओं से मन उदास जरूर हुआ, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। लगातार मेहनत और दृढ़ संकल्प के बल पर उन्होंने असफलताओं को पराजित किया और वर्ष 2017 में यूपीएससी परीक्षा में देश में 40वां रैंक हासिल की।
इस उपलब्धि के लिए उन्होंने अपनी कॉरपोरेट नौकरी भी छोड़ दी थी। दिन-रात की मेहनत और अनुशासन ने आखिरकार उन्हें मंजिल तक पहुंचाया और असफलता की कड़वाहट को सफलता की मिठास में बदल दिया। अपराजिता के प्रशासनिक अधिकारी बनने की नींव बचपन में ही पड़ गई थी। उनके नाना अक्सर कहा करते थे कि उनकी बिटिया एक दिन बड़ी अफसर बनेगी। उस समय नन्हीं अपराजिता को यह भी नहीं पता था कि अफसर या आईएएस क्या होता है, लेकिन नाना की उन बातों ने अवचेतन मन में एक सपना बो दिया था।
उनके पिता आईआरएस अधिकारी रहे हैं और उनकी मां प्रोफेसर रही हैं। ऐसे में घर का वातावरण शुरू से ही शिक्षा और अनुशासन से भरा रहा। अपराजिता वर्ष 2018 बैच की आईएएस अधिकारी हैं।
कॉरपोरेट की सुख-सुविधाओं का किया त्याग
स्कूली शिक्षा बनारस से पूरी करने के बाद अपराजिता ने बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रांची से केमिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। स्नातक के बाद उन्होंने एक प्रतिष्ठित कंपनी में कॉरपोरेट नौकरी शुरू की। जीवन में स्थिरता थी और अच्छी सैलरी भी, लेकिन उनके भीतर कुछ बड़ा करने की चाह और नाना का अधूरा सपना उन्हें लगातार प्रेरित करता रहा।
आखिरकार उन्होंने एक साहसिक निर्णय लेते हुए अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ दी और खुद को यूपीएससी की कठिन तैयारी में पूरी तरह समर्पित कर दिया। अपराजिता ने अपने कॅरिअर में न केवल सुरक्षित नौकरी का त्याग किया, बल्कि हर चुनौती का सामना करते हुए महिला सशक्तीकरण की एक प्रेरक मिसाल भी पेश की।
उनका कहना है कि जीवन में असफलताओं से घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि वही हमें अपनी कमियों को समझने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। असफलता ही कड़ी मेहनत के बाद मंजिल तक पहुंचने का रास्ता दिखाती है।
अपराजिता : जिसे पराजित न किया जा सके
यूपीएससी का सफर अपराजिता के लिए बिल्कुल आसान नहीं था। अपने शुरुआती दो प्रयासों में उन्हें असफलता का सामना करना पड़ा। किसी भी प्रतियोगी के लिए लगातार दो बार असफल होना मानसिक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन अपने नाम की तरह अपराजिता ने खुद को पराजित नहीं होने दिया।
उन्होंने अपनी पिछली गलतियों का गंभीरता से विश्लेषण किया, तैयारी की रणनीति बदली और तीसरे प्रयास के लिए दोगुनी मेहनत के साथ जुट गईं। वर्ष 2017 उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। तीसरे प्रयास में उन्होंने न केवल यूपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण की, बल्कि पूरे देश में 40वीं रैंक हासिल कर टॉपर्स की सूची में जगह बनाई।
आज वे कैथल में एक सफल आईएएस अधिकारी के रूप में देश की सेवा कर रही हैं और अपनी मेहनत से अपने नाना के सपने को हकीकत में बदल चुकी हैं। उनकी कहानी हर उस महिला के लिए प्रेरणा है जो अपने सपनों को साकार करना चाहती है और कठिनाइयों से लड़ते हुए आगे बढ़ने का साहस रखती है।