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योग निद्रा से आज जागेंगे भगवान विष्णु, होगा तुलसी विवाह

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कलायत। इस वर्ष देवउठनी एकादशी चार नवंबर (शुक्रवार) को है अर्थात योग निद्रा से भगवान विष्णु के जागने का समय। इसी दिन तुलसी विवाह भी होगा। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन से सभी मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं लेकिन इस बार शुक्र अस्त होने से ऐसा नहीं होगा।
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इस साल 20 नवंबर को शुक्र उदय होंगे और तब मांगलिक कार्य का प्रारंभ हो सकेगा। पंडित विशाल शांडिल्य ने बताया कि विवाह के लिए ग्रह-नक्षत्रों की शुभ स्थिति भी काफी महत्व रखती है। उन्होंने बताया कि इसी दिन हिंदू धर्म का प्रमुख पर्व तुलसी विवाह भी मनाया जाएगा। तुलसी विवाह में माता तुलसी देवी का विवाह भगवान शालिग्राम जी के साथ किया जाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति तुलसी विवाह का अनुष्ठान करता है उसे कन्यादान के बराबर पुण्य फल मिलता है। तुलसी विवाह भारत के अनेक प्रदेशों में मनाया जाता है। शालिग्राम को भगवान विष्णु जी व तुलसी को मां लक्ष्मी का अवतार माना जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार तुलसी मैया ने गुस्से में भगवान विष्णु जी को श्राप से पत्थर बना दिया था। तुलसी देवी के इस श्राप से मुक्ति के लिए भगवान विष्णु ने शालिग्राम जी का अवतार लिया और तुलसी जी से विवाह किया। कुछ स्थानों पर तुलसी विवाह द्वादशी के दिन भी किया जाता है।
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उन्होेंने बताया कि शुक्र का उदय 20 नवंबर को होगा। इस वर्ष दिसंबर तक महज 12 लग्न मुहूर्त ही विवाह आदि मांगलिक कार्यों के लिए हैं। नवंबर में 24, 25 व 26 और दिसंबर में 2, 3, 7, 8, 9, 13 , 14 , 15 एवं 16 दिसंबर को ही विवाह का लग्न प्राप्त होगा। इसके बाद देव गुरु बृहस्पति की राशि धनु में सूर्य देव का गोचरीय संचरण आरंभ हो जाएगा। सूर्य के धनु राशि मे प्रवेश करने के साथ ही खरमास का आरंभ हो जाएगा । अत: एक बार फिर एक महीने तक विवाह आदि शुभ कार्यों के लिए मुहूर्तों का अभाव हो जाएगा क्योंकि खरमास में विवाह आदि जैसे मांगलिक कार्य संपादित नहीं होते हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि इस दिन अगर उपवास न कर सके तो एक समय फलाहार करना चाहिए और संयम नियम पूर्वक रहना चाहिए एकादशी को भगवत नाम का जप कीर्तन करना चाहिए। इसकी विशेष महिमा है शुक्ल एकादशी को भगवत प्रीति के लिए पूजा-पाठ व्रत उपवास आदि किया जाता है। इस तिथि को रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। रात्रि में भगवत संबंधी कीर्तन, नृत्य और पुराणों का पाठ करना चाहिए। धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, गंध, चंदन, फल आदि से भगवान की पूजा करके घंटे, शंख, मृदंग आदि वाद्य यंत्र की मांगलिक ध्वनि और मंत्रों द्वारा भगवान से जागने की प्रार्थना करनी चाहिए। इसके बाद भगवान की आरती करें पुष्पांजलि अर्पित करें और तब प्रह्लाद नारद परशुराम पुंडरीक व्यास श्री कृष्ण और भीष्म आदि भक्तों का स्मरण करके चरणामृत और प्रसाद का वितरण करना चाहिए।
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