संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल आने वाले मरीजों को अगर इलाज के साथ डर भी झेलना पड़े तो स्थिति कितनी भयावह होगी, इसका अंदाजा बात्ता गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) से लगाया जा सकता है। यहां मरीजों का इलाज जर्जर भवन के साए में होता है। छत का लिंटर जगह-जगह से उखड़ रहा है, दीवारों में गहरी दरारें हैं और कई कमरे पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं।
बारिश के समय यहां छत टपकती है और कमरों के अंदर पानी भर जाता है। बावजूद इसके मरम्मत या पुनर्निर्माण की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। ग्रामीणों का कहना है कि भवन का उद्घाटन 1993 में हुआ था और तब से अब तक इसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही है।
सीनियर मेडिकल ऑफिसर की ओर से कई बार लोक निर्माण विभाग और सिविल सर्जन को इस संबंध में पत्र भेजे गए हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ निरीक्षण तक ही बात सीमित रही है। ग्रामीणों ने सरकार से भवन को नए सिरे से बनवाने की मांग की है, ताकि कोई बड़ा हादसा होने से पहले हालात सुधर सकें।
इस पीएचसी पर आसपास के छह गांवों की लगभग 30 हजार की आबादी इलाज के लिए निर्भर है। हर महीने यहां 5 से 7 गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी होती है मगर जिस कक्ष में प्रसव कराया जाता है, उसकी छत का लिंटर उखड़ रहा है और दीवारों में गहरी दरारें हैं। बरसात के मौसम में हालात और भी गंभीर हो जाते हैं- कमरों में पानी टपकता है, फर्श फिसलन भरा हो जाता है और बिजली व्यवस्था भी जोखिम में आ जाती है।
ग्रामीण बताते हैं कि कई बार छत से लिंटर का मलबा गिरने की घटनाएं हो चुकी हैं। मरीजों और स्टाफ को डर के साए में काम करना पड़ता है। हालत यह है कि कुछ कमरे अब पूरी तरह असुरक्षित घोषित करने की स्थिति में हैं।
अधिकारियों को कराया गया अवगत
लोक निर्माण विभाग के कर्मचारी एक बार भवन का निरीक्षण कर चुके हैं। विभाग को दोबारा निरीक्षण के लिए पत्र लिखा गया है। इस जर्जर इमारत की सूचना सिविल सर्जन कार्यालय को भी दी जा चुकी है। -डॉ. किरण संधू, सीनियर मेडिकल ऑफिसर
बात्ता पीएचसी का भवन। संवाद