29 पूंडरी। अपने लड्डू गोपाल के साथ कांता रानी गिरधर। स्वयं
पूंडरी। मेरे घर में लड्डू गोपाल केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य के रूप में पूजे और सहेजे जाते हैं। जैसे कोई सगा बच्चा होता है, उसी तरह वे लड्डू गोपाल की सेवा करती हैं। लड्डू गोपाल अब केवल भगवान नहीं, हमारे परिवार के बाल सदस्य हैं। उनके बिना दिन अधूरा लगता है।
लड्डू गोपाल की सेवा, भोजन, वस्त्र, स्नान आदि सभी कार्यों को वे नियमित दिनचर्या का हिस्सा मानती हैं। वह अपने लड्डू गोपाल काोलगभग 15 वर्ष पहले वृंदावन से लेकर आई थीं और तभी से उनका यह संबंध लगातार गहरा होता गया।
लड्डू गोपाल उनके घर के संवेदना, आस्था और श्रद्धा का प्रतीक बन चुके हैं। परिवार के हर त्योहार और विशेष अवसर पर पहले लड्डू गोपाल को शामिल किया जाता है। उनके लिए विशेष पोशाकें भी सिलवाई जाती हैं और मौसम के अनुसार उन्हें भोजन कराया जाता है।
प्रस्तुति : कांता रानी गिरधर, निवासी, पूंडरी।