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जिंदगी से खिलवाड़ : खटारा एंबुलेंस में ऑक्सीजन सिलिंडर न फायर सिस्टम

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knocked out ambulence - फोटो : Kaithal
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जिले में प्राइवेट अस्पतालों की मिली भगत से खटारा एंबुलेंस से मरीजों की जान जोखिम में डालने का धंधा जोर शोर से चल रहा है। यह नहीं देखा जाता कि एंबुलेंस की जरूरत आपात स्थिति में होती है, उस समय मरीज को आक्सीजन की जरूरत हो सकती है। गाड़ी बेहतर कंडीशन की हो, साथ में स्टेपनी भी हो। स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी रखने वाले एक्सपर्ट व्यक्ति भी एंबुलेंस के साथ हो। लेकिन इनमें से किसी भी नियम और मानक का पालन नहीं होता है। नियमों को ताक में रखकर चल रहीं एंबुलेंस को कोई भी रोकने-टोकने वाला नहीं हैं। किराये के नाम पर मनमानी वसूली होती है। इन्हीं लापरवाहियों का नतीजा रहा है कि डेढ़ माह के मासूम विहान की मौत हो गई।
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जिले में 30 एंबुलेंस
जिले में करीब 30 एंबुलेंस सरपट सड़कों पर दौड़ रहीं हैं। जिनमें एक अस्पताल के सामने खड़ी एंबुलेंस गाड़ियों को देखा तो उनमें से कइयों में साइडों के शीशे नहीं थे, कई की लाइटें टूटी हुई हैं। कई गाड़ियों में फायर सिलेंडर नहीं हैं। यहां तक की स्टपनी तक नहीं हैं। पंक्चर हो जाए तो दुकान पर ही निर्भर रहते हैं। ऐसा नहीं है कि मरीज का जीवन बचाने के लिए स्टपनी रखी गई हो। कुछेक एंबुलेंस की हालत ठीक दिखी। जिसमें सभी उपकरण व गाड़ी की हालत भी ठीक थी। यहां सरकारी एंबुलेंस की संख्या 15 हैं। जिनमें 8 नई हैं व 7 पुरानी हैं। इनमेें 10 ऑक्सीजन सिलिंडर युक्त हैं।
किराया और सुविधाओं की मॉनिटरिंग नहीं
एंबुलेंस में किराये व सुविधाओं की कोई मॉनिटरिंग नहीं हैं। आरटीए कार्यालय में इनका एक बार रजिस्ट्रेशन जरूर होता है। इसके बाद उस एंबुलेंस में तय मानकों के अनुसार सुविधाएं हैं या नहीं। एंबुलेंस चालक किस मरीज से कहां तक का कितना किराया लेंगे? यह उनकी मर्जी पर है। समाज सेवी राजू डोहर ने कहा कि कई एंबुलेंस चालक मनमाना किराया वसूलते हैं। एकाध व्यक्ति की तो कई-कई एंबुलेंस चल रहीं हैं। कई बार लोग उनसे बहस कर चुके हैं। लेकिन अपने परिजनों के इलाज करवाने में व्यस्त लोग उस समय एंबुलेंस की ओर ज्यादा ध्यान नहीं देते। चाहे उनसे कितने भी ज्यादा रुपये क्यों ना वसूले हों। प्रशासन को ऐसे एंबुलेंस संचालकों पर अंकुश लगाना चाहिए।
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उन्होंने डीसी कैथल को शिकायत दी थी। जिसमें कहा गया था कि सड़क हादसे के घायलों को अस्पताल में लाने वाले वाहनों को देखकर प्राइवेट एंबुलेंस वाले पीछे-पीछे एंबुलेंस लगा लेते हैं। जैसे ही उसे रेफर किया जाता है तो उसके मरीज को अपनी एंबुलेंस ले जाते हैं। बाद में उनसे डबल किराया वसूलते हैं। यहां तक कि ये जिला अस्पताल से श्मशान घाट तक के भी 500 रुपये वसूल लेते हैं। इसके बावजूद जिला अस्पताल में हालात जस के तस हैं।
जिम्मेदारी से बच रहे हैं विभाग
सीएमओ डा. सुरेंद्र नैन का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग की जितनी भी एंबुलेंस हैं। उनकी जिम्मेवारी विभाग की है। प्राइवेट एंबुलेंस की विभाग की कोई जानकारी नहीं हैं। ना ही विभाग उन्हें मॉनिटर करता। वहीं आरटीए जगदीप सिंह का कहना है कि विभाग एक बार एंबुलेंस की रजिस्ट्रेशन करता है। इसके बाद एंबुलेंस संचालक की जिम्मेवारी बन जाती है कि वह नियमों का पालन करे। इनकी मॉनिटरिंग कौन करता है। कितनी एंबुलेंस हैं। इस बारे में जानकारी नहीं हैं। विभागीय अधिकारी कई बार मानवता के चलते व मरीज के इलाज में बाधा ना आए। इसीलिए एंबुलेंस की कई बार जांच भी नहीं करते।
टैक्स फ्री कामर्शियल वाहन की श्रेणी में होता है रजिस्ट्रेशन
रेडक्रॉस सचिव बलवान सिंह खिदरपुरा का कहना है कि एंबुलेंस के लिए बतौर कामर्शियल वाहन रजिस्ट्रेशन आरटीए में होता है। इसकी अनुमति स्टेट ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी से मिलती है। एंबुलेंस वाहन का रजिस्ट्रेशन एंबुलेंस के तौर पर ही होता है। किसी अन्य वाहन को इसमें प्रयोग नहीं किया जा सकता। कई कंपनियां स्ट्रेचर आदि की सेटिंग करके एंबुलेंस उपलब्ध करवाती हैं। जिसमें बाद एंबुलेंस मालिक, या फिर खरीदने वाली संस्था या फिर सरकारी विभाग द्वारा उस एंबुलेंस में प्राथमिक उपचार किट, ऑक्सीजन सिलेंडर, फायर सिलेंडर व अन्य जरूरी उपकरण खुद लगाने होते हैं। इसकी जिम्मेवारी उसके मालिक की होती है कि वह समय-समय पर इन सुविधाओं की मॉनिटरिंग कर सके।

knocked out ambulence- फोटो : Kaithal

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