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बारह किल्ले थे...छह नहर मै चले गए...साढ़े पांच इब सड़क मै...

Fri, 31 Jul 2015 12:19 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/पानीपत
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म्हारे 12 किल्ले थे। 6 किल्ले चले गए नहर (हांसी बुटाना लिंक नहर) मै। उस टैम पीस्से दिए थे साढ़े छह लाख किल्ले के।
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इब साढे़ पांच किल्ले सड़क में जाण लाग रै सैं...बच ग्या आधा किल्ला। कै खावांगै। मेरी 6 ननद, 8 फूफूस थी...आगे 4 छोरी सैं...एकै छोरा सै कमाण आला। जे इनके बी पीस्से पूरे ना मिले तै भात क्यूकर भरांगे.. आगे खर्चे क्यूकर चाल्लंगे...?

गांव हरसौला की कमलेश की यह पीड़ा अकेली उसकी नहीं है। कुछ इस तरह की पीड़ा है अनेक परिवारों एवं महिलाओं की। जिनकी जमीन सड़क के लिए किए गए अधिग्रहण में चली गई। इसी तरह की अनेक महिलाएं तितरम मोड़ पर धरना स्थल पर आई हुई हैं।
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जो हर रोज जिस खेत में से चारा-पानी लेकर आती थीं। उन खेतों के सड़क में चले जाने के बाद से व्यथित तो वैसे भी थीं। लेकिन कीमत भी सही न मिल पाने के कारण इन महिलाओं को भी भविष्य की चिंता सताने लगी है। इन महिलाओं के साथ-साथ परिवारों की पढ़ी लिखी महिलाएं भी धरनास्थल पर आ रही हैं। जो बाकायदा हाजिरी रजिस्टर संभाले हुए हैं।

कमलेश की ही देवरानी सावित्री की भी यही कहानी है। उसने भी बताया कि हांसी बुटाना लिंक नहर में उनके भी किल्ले सरकार ने ले लिए थे।

उनके पास भी 12 एकड़ जमीन थी। आगे की चिंता इन महिलाओं को सताए जा रही है। धरना स्थल पर आई हरसौला से ही बीरो देवी ने कहा कि डेढ़ एकड़ था रे बेटा...वा सारा का सारा सड़क में चला गया। कमाण आला एकै बेटा सै बेरा नी कै बणै गा...

हरसौला की ही सरुपी देवी का कहना है कि मेरे दो बेटे हैं। दोनों को आधा-आधा किल्ला हिस्से में आया था। इस सड़क के निकल जाने के बाद यह एक किल्ला भी चला गया।

इसी प्रकार से बुजुर्ग ओमी देवी ने कहा कि पारिवारिक हालत के कारण आधा किल्ला पहले बिक गया था। आधा किला अब सड़क में आ गया है। उसकी भी कीमत सही नहीं मिली तो न जाने परिवार का क्या होगा।

हक के लिए सभी एकजुट:-धरनास्थल पर आई मुकेश देवी हाजिरी रजिस्टर में लाईनें लगाते हुए हाजिरी लगवाना सुनिश्चित कर रही थीं। मुकेश से पूछा तो उसका कहना था कि वह जमीन अधिग्रहण हो रहा है, उसके लिए कीमत सही नहीं मिल रही। इसके विरोध में यहां आई है।
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25 से 30 हजार रुपये हर रोज का खर्च:-धरना स्थल पर हर रोज किसानों का खर्च बढ़ता जा रहा है। हर रोज लोगों के लिए सुबह, दोपहर एवं शाम के खाने के साथ-साथ चाय का लंगर चल रहा है। जिसका पूरा खर्च किसानों द्वारा एकत्रित की जा रही राशि से उठाया जा रहा है। बाकायदा ढाबे पर पूरा खाना तैयार हो रहा है। तीन बड़े पंखें ट्रेक्टरों की सहायता से चलाए जा रहे हैं।
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