सरकार द्वारा हेपेटाइटिस-सी की दवाओं में देरी के कारण लोगों और अधिकारियों की परेशानियां बढ़ने लगी हैं। ऐसी ही एक परेशानी के चलते मरीजों के साथ-साथ स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। अज्ञात लोगों ने दर्जनों गांवों में फोन कर हेपेटाइटिस-सी के मरीजों को सूचना दी कि अस्पताल में दवा आई हुई है। सुबह अस्पताल पहुंच कर दवा ले लें। जब लोग अस्पताल पहुंचे तो स्थिति जस की तस मिलीं। सीएमओ ने कहा कि जिन नंबरों से लोगों को फोन किया गया है। उन नंबरों का पता करवाकर पुलिस कार्रवाई करवाई जाएगी।
दरअसल सरकार ने इसी साल से फैसला लिया है कि हेपेटाइटिस-सी में पहले केवल बीपीएल एवं अनुसूचित जाति की तरह से सामान्य वर्ग के लोगों का भी नि:शुल्क इलाज किया जाएगा। इसके दो माह पहले दवाएं भेज दी गई थीं। लेकिन ये इतनी कम संख्या में थीं कि अभी तक यहां 65 लोगों को दवा मिली है। लेकिन रजिस्ट्रेशन 1 हजार से भी ज्यादा का हो चुका है। लोग हर रोज अस्पताल का चक्कर काट रहे हैं।
अज्ञात लोगों ने फोन कर कहा की दवा आई है ले जाओ
इसी बीच गांव किठाना, संदलखेड़ी, रोहेड़ माजरा सहित कई गांवों में अलग-अलग मोबाइल नंबरों से लोगों ने फोन किए और कह दिया कि आपने हेपेटाइटिस-सी अथवा काला पीलिया के लिए अस्पताल में रजिस्ट्रेशन करवाया है। आपकी दवा आ गई है। सुबह अस्पताल पहुंच कर दवा ले लेना। गांव जाखौली के सोनू, रोहेड़ा के सोनू, जाखौली से पिंकी, खजानी, महेंद्र सिंह, राजबाला रोहेड़ा सहित अन्य ने कहा कि उन्हें फोन करके यहां बुलाया गया। अब यहां कहा जा रहा है कि दवा नहीं। अधिकारी कह रहे हैं कि उन्होंने नहीं बुलाया। यदि नहीं बुलाया तो ये फोन करने वाले कौन हैं और उनके पास मरीजों के नंबर कहां से आए। जो केवल सरकारी अस्पताल में दिए गए हैं।
सीएमओ कार्यालय के कर्मचारी ने जब फोन करने वाले नंबर पर कॉल किया तो सामने के व्यक्ति ने खुद को एनजीओ का कर्मचारी बता कर फोन काट दिया।
वहीं सीएमओ डा. मनीष बंसल ने कहा कि कोई प्राइवेट कंपनी के कर्मचारी लोगों को परेशान करने के लिए इस तरह के फोन कर रहे हैं। जबकि यहां नियमानुसार दवा दी जा रही है। अभी तक 65 लोगों की दवा आई है। आगे जैसे ही दवा आएगी, उसे नियमानुसार दिया जाएगा। जो लोग फोन कर रहे हैं, उनका पता करवाया जा रहा है। ये कौन हैं और पुलिस में शिकायत दी जाएगी।
प्राइवेट कंपनी की हो सकती है साजिश
हेपेटाइटिस-सी के इलाज के लिए एक मरीज पर करीब 30 हजार रुपये खर्च आ रहा था। जिसमें निजी कंपनियों की खूब चांदी बनी हुई थी। अब जब सरकार ने सभी वर्गों के लिए यह नि:शुल्क कर दिया है तो निजी कंपनियों को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है। जिस कारण आशंका जताई जा रही है कि किसी निजी कंपनी की ही साजिश हो सकती है कि दवा को लेकर सरकारी अस्पताल में भीड़ उमड़ेगी और हंगामा होने पर लोग निजी कंपनियों से ही इलाज के लिए मजबूर हो जाएं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने बताया कि मामले की पूरी जांच करवाई जाएगी। ताकि जरूरतमंद एवं गरीब लोगों के साथ हो रहे मजाक व लूट को बंद किया जा सके।