कैथल। शहर में 40 साल से अधिक समय से चलिया व्रत की परंपरा चली आ रही है। यह आयोजन दशहरा के उपलक्ष्य में किया जाता है। इसमें पाकिस्तान के हिंदुओं की परंपरा का निर्वहन करते हुए लगातार 40 दिन तक व्रत करते हैं। इस बार भी शहर में 20 से अधिक जगहों पर भव्य दरबार सजाए गए हैं।
इस दरबार में भगवान हनुमान के स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद पर्व पर दंडवत परिक्रमा करते हैं। इसके बाद दशहरे से अगले दिन चलिया व्रत का समापन होता है। कैथल में करीब 40 साल पहले इस परंपरा को शुरू किया गया था।
शहर में प्रताप गेट स्थित श्री हनुमान सेवा समिति सबसे अधिक पुरानी है। इस समिति की शुरुआत बिल्ला भगत ने की थी। इस कार्यक्रम का आयोजन करने वाले समितियों के सदस्य दशहरा पर्व पर भगवान हनुमान के स्वरूप धारण कर घरों में परिक्रमा कर आशीर्वाद भी देते हैं। इसमें वे दंडवत करते हुए शहर की परिक्रमा करते हैं।
दशहरा पर्व पर शहरवासी स्वरूप धारण करे हुए युवाओं को अपने घर पर आशीर्वाद देने के लिए निमंत्रण भी देते हैं। इस बीच लोग घरों एवं प्रतिष्ठानों में हनुमान जी के स्वरूप को आमंत्रित कर उनकी पूजा करते हैं।
दशहरे पर शहर की सड़कों पर हनुमान सेना घूमती है। जगह-जगह इस सेना का स्वागत किया जाता है। रावण के पुतला दहन से पहले सैकड़ों की संख्या में हनुमान सेना पहुंचती है। इस दौरान हनुमान सेना अपना पराक्रम दिखाती है। इसके बा पटाखे जलाए जाते है, आतिशबाजी होती है। इसके बाद ही रावण के पुतले का दहन होता है। संवाद
यह है परंपरा
प्रताप गेट स्थित हनुमान सेवा समिति के प्रधान गौरव ने बताया कि युवा 40 दिन का व्रत दशहरा पर्व से शुरू करते हैं। ये युवा सिर पर हनुमान जी का विशेष स्वरूप रखते हुए उनका रूप ग्रहण करते हैं। वह 40 दिनों तक दिन में एक समय खाना खाते हैं। नंगे पांव रहते हैं और हनुमान जी के दरबार में ही सोते हैं। दशहरा के दिन शहर की परिक्रमा पूरी करने के बाद ही यह व्रत पूरा होता है।
स्वरूपों के साथ चलिया व्रत का यह है इतिहास ः कमल मक्कड़
महादेव कॉलोनी स्थित मां अंजनी हनुमान सेवा समिति के सदस्य कमल मक्कड़ ने बताया कि आजादी से पहले पाकिस्तान में पंजाबी समुदाय से संबंध रखने वाले लहईया समाज ने दशहरा पर्व पर भगवान हनुमान के स्वरूप धारण करने की परंपरा शुरू की थी।
इस परंपरा का निर्वहन मन्नत पूरी होने पर किया जाता था। जब आजादी के बाद भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो इस समुदाय के लोग भगवान हनुमान के इन स्वरूपों को पानीपत में साथ लेकर आए थे। उसके बाद सबसे पहले पानीपत और फिर बाद में कैथल व करनाल में यह परंपरा निभाई जाने लगी।
ब्रह्मचर्य का किया जाता है पालन ः इस यात्रा में समितियों के वह युवा हिस्सा लेते हैं, जो दशहरे से पहले 41 या 21 दिन तक ब्रह्मचर्य धारण कर घर और व्यवसाय त्यागकर व्रत करते हैं।
वह व्रत रखकर एक समय खाना खाते हैं व जमीन पर ही सोते हैं। श्रद्धालु मन्नत मांगते हैं। शहर में प्रताप गेट, सीवन गेट, डोगरा गेट, महादेव कालोनी स्थित समितियों की ओर से व्रतधारी युवा हनुमान के मुकुट वाला स्वरूप धारण कर शहर में परिक्रमा करते हैं। समितियों की ओर से रावण के पुतला बनाया जाता है। स्वरूपो की ओर से शहर की परिक्रमा पूरी करने के बाद अंत में स्वरूप रावण के पुतले पर सोटा मारते हैं। इसके बाद यह प्रक्रिया समाप्त होती है।