गुहला-चीका। धान के अवशेष जलाने पर रोक लगाने के लिए प्रदेश सरकार व जिला प्रशासन की ओर से की गई सख्ती और जागरूकता का असर इस बार कस्बे के किसानों में दिखा। उन्होंने धान के अवशेषों को जलाने के बजाय उनकी गाठें तैयार करवाईं। धान अवशेष (पराली) का उपयोग अब गत्ता और इथेनॉल तैयार करने के लिए होने लगा है।
जानकारी के अनुसार गुहला उपमंडल क्षेत्र के किसान क्षेत्र में पराली की बेलर मशीन से गांठें बनवाकर प्लांट में भेज रहे हैं, जहां पर इसका निस्तारण हो रहा है। उम्मीद है कि इससे पराली जलाने से होने वाले नुकसान से बचा जा सकेगा। गुहला उपमंडल में एक लाख 20 हजार 815 एकड़ भूमि में धान की बिजाई की गई थी। इसमें से करीब 98 फीसदी एक लाख 18 हजार 398 एकड़ में से धान की कटाई का कार्य पूरा हो गया है। कृषि विभाग के अनुसार बेलरों से कई हजार एकड़ भूमि से धान की पराली की गांठें तैयार करके प्लांट में भेजी जा चुकी हैं। बेलर संचालक बेलरी से पराली के रोल बनाकर सीमांत क्षेत्र में प्लांट को भेज रहे हैं। यह अब तक काटी गई धान का 98 फीसदी आंकड़ा है। इससे प्रशासन के साथ किसानों को काफी राहत मिल रही है।
गुहला-चीका क्षेत्र में होती है सबसे अधिक धान की फसल
गुहला-चीका देहात क्षेत्र में ज्यादातर धान फसल का उत्पादन ही किया जाता है। इसलिए यहां पर पराली प्रबंधन पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। दिवाली से पहले हर साल पराली जलाने की अनेकों घटनाएं सामने आती हैं, जिससे पर्यावरण को नुकसान होता है। शासन और प्रशासन के लिए सिरदर्द बनी किसानों के खेतों में जलने वाली धान की पराली का निस्तारण क्षेत्र में बेलरों से किया जा रहा है। किसान खेत में पराली न जलाएं, इसके लिए इस बार शासन और प्रशासन बेहद गंभीर है। तहसील, खंड व ग्राम पंचायत स्तरों पर निगरानी समितियों का गठन किया गया है। धान की कटाई के बाद पराली के निस्तारण के लिए स्थानीय किसानों के कई बेलर क्षेत्र में पराली उठाने के लिए लगाए गए हैं।
किसान जान-बूझकर पराली नहीं जलाते हैं। अगर उन्हें धान की कटाई के बाद तुरंत बेलर मिल जाएं तो गांठें बनवाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। इस बार पहले से अधिक जागरूकता बढ़ी है।
- जसपाल उर्फ पाली, गांव टटियाना।
घग्गर पार के अधिकतर किसान धान की फसल लेते हैं। बेलरों की मांग लगातार किसान कर रहे हैं। जिनको जल्दी मिल जाते है, वहां पराली की गांठे व रोल बनवाए जा रहे हैं।
- जस्सा पूनिया, किसान, गांव अरनौली
किसान स्वयं भी अब जागरूक होने लगा है। पराली का प्रबंधन करवाने में किसान दिलचस्पी ले रहा है। यही कारण है कि इस बार पिछले सालों के मुकाबले बेहद कम पराली जलाने के मामले आए हैं।
शिवकुमार, ग्रामीण, गांव ककहेडी
बेलर संचालक बेलरों से पराली के रोल बनाकर आसपास के क्षेत्र में प्लांट को भेज रहे हैं। इससे प्रशासन के साथ-साथ किसानों को काफी राहत मिल रही है।
- केवल सिंह, किसान, संदरेहड़ी
वर्जन
धान के अवशेष न जलाने की अपील का असर किसानों पर दिख रहा हैं। इस बार खेतों में धान की पराली जलाने के 86 केस सामने आए हैं जबकि बीते साल 126 केस मिले थे। जागरूकता का असर दिख रहा है। इस बार पराली जलाने को लेकर 14 किसानों पर एफआईआर दर्ज हुई है। जबकि पिछले साल 40 किसानों पर एफआईआर दर्ज हुई थी।
- डॉ. कंचन शर्मा, उपमंडल कृषि अधिकारी, चीका।