कैथल। आरकेएसडी कॉलेज के अध्यापक कक्ष में साहित्य सभा की मासिक काव्य-गोष्ठी हुई। काव्य-गोष्ठी का संचालन हरियाणवी गजलकार रिसाल जांगड़ा ने किया। गोष्ठी के दौरान निकट भविष्य में साहित्य सभा के आयोजित किए जाने वाले वार्षिक समारोह में विचार रखे।
गोष्ठी के तुरंत बाद साहित्य सभा की कार्यकारिणी के पदाधिकारियों और सदस्यों की बैठक आयोजित की गई, जिसमें नवंबर माह के अंतिम सप्ताह में संभावित वार्षिक समारोह के कुछ बिंदुओं पर चर्चा की। गोष्ठी का आरंभ दिनेश बंसल दानिश की गजल से हुआ। दिनेश ने कहा रिंद पेट के कीड़ों को मारने, पीते हैं सुबह रात का नशा उतारने। रवींद्र रवि ने कहा बिल्कुल सीधा-सादा बन। खद्दर वाला कुर्ता बन। इस दुनिया का कड़वा सच, जीना है तो झूठा बन। राजेश भारती ने कहा जीत गया कोई हार गया, अपनी-अपनी किस्मत है। अनिल गर्ग ने कहा जीना भी दुश्वार लगता है। मरना भी दुश्वार लगता है।
बलवान कुंडू ने कहा मैंने लहलहाई हैं फसलें प्रेम की, मैं देश-द्रोही नहीं। शमशेर सिंह कैंदल हम सफीर ने कहा लोकतंत्र लोगों का शासन मगर नजदीक ही तानाशाही की घटा। क्यों हुए चारों स्तंभ क्षीण, क्योंकि आवाम का ध्यान हटा। डॉ. तेजिंद्र ने कहा मैने पत्नी से कहा, तुम किशमिश हो। तुम काजू हो, तुम बादाम हो, पत्नी ने पूछा, और तुम? मैने कहा कि मैं तो पिस्ता था, पिस्ता हूं और पिस्ता रहूंगा। पिता को सम्मान देते हुए कहा कि रजनीश शर्मा कहतीं हैं खूबियां उनकी गिनवाऊं तो शब्द ही नहीं बचे, इंसान के सादे वेश में, भगवान ही तो थे पापा।
विनोद कुमार का इश्क उनकी गजल के इस शेर में उजागर हुआ दोस्तों दिल दिया था, यही सोच कर मुस्कुरायेंगे वो भी हमें देखकर। मां के प्यार को भूल रहे इंसान को लताड़ते हुए सूरजभान शांडिल्य ने कहा मां की ममता, आंचल की छाया। मां का प्यार, मां का दुलार, क्यों भूल रहा संसार? मां की कृपा के कमाल से गदगद हुए महेंद्र पाल सारस्वत ने कहा करया भवानी की प्रीत नै कमाल, जलाई इसी जोत मेरै। मेरा जीवन ही लिया रे संभाल, या आड्डी आई बहोत मेरै। रामफल गौड़ ने कहा लोग कहैं सै बेरा नी कित, हरि का नाम-निस्यान सै। आंख खोल कै देख लियो या दुनियां ही भगवान सै। उपेंद्र गर्ग ने कहा कि योजनायें कागज पर जन्म लेती हैं। कागज पर जवान होती हैं। कागज पर ही दम तोड़ देतीं हैं। मधु गोयल मधुल ने कहा रक्तदान करके जऱा, पा ले सबका प्यार। एकबूंद से हो जाये, घायल का उपचार। रिसाल जांगड़ा ने कहा जिस घर मैं हो नहीं एकता, संकट मैं वो फंस्या करै। एक्का हो तो बिन भय-चिंता, माणस ठाठ तै बस्या करै।