संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। जाखौली अड्डा स्थित राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में शुक्रवार को हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में अमर उजाला संवाद कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें हिंदी विषय की शिक्षिकाओं सहित अन्य अध्यापकों ने हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि हिंदी हमारी मातृ भाषा ही नहीं, हमारा व्यवहार भी है।
संवाद कार्यक्रम में हिंदी भाषा के महत्व पर प्रकाश डाला गया। इसमें शिक्षकों से हिंदी हमारे लिए क्याें जरूरी है... विषय पर चर्चा की गई। इस मौके पर कार्यक्रम में पूनम मलिक, सोनिया गुप्ता, मधु शर्मा, सोनिया आदि मौजूद रहीं।
विद्यालय की अध्यापिका पूनम रंगा ने कहा कि हम भारत में रहते हैं तो हिंदी हमारे लिए बहुत जरूरी है। हमारी भाषा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें हम अपने भाव को व्यक्त कर सकें और हिंदी ही ऐसी भाषा है, जिसमें हम अपने भाव प्रकट कर सकते हैं। इससे दूसरे के विचारों को भी समझ सकता है।
उन्होंने कहा कि विभाग भी समय-समय पर हिंदी को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न कार्यक्रम स्कूलों और कॉलेजों में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हम अपने विचार अपनी मातृ भाषा में ही दे सकते हैं। जबकि अन्य भाषाओं में नहीं दे सकते।
अध्यापिका मनीषा धारीवाल ने कहा कि यदि हम अपनी मातृ भाषा को बढ़ावा देंगे तो हम और आगे निकल पाएंगे। हमें स्वयं ही स्वीकार करना होगा कि यह काफी बेहतर भाषा हमारे लिए हैं। इसमें हमें रुचि लेकर इसे जरूर अपनाना चाहिए।
अध्यापिका सोनिया ने कहा कि हिंदी दिवस का प्रचार भी हमें जरूर करना चाहिए। कार्यालय के सभी काम भी हिंदी में होना चाहिए। हम इस भाषा में अपने विचार भी प्रकट कर सकते और शिकायत भी आसानी से दें सकते हैं।
अध्यापिका मधु ने कहा कि हिंदी विषय हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जब हमारा देश आजाद हुआ तो उस समय हिंदी भाषा का काफी योगदान आजादी में भी रही थी। 1954 में हिंदी को मातृ भाषा बनाने पर विचार शुरू हुआ था। उस समय विचार हुआ कि हिंदी और उर्दू का विषय होगा। तब हिंदी ही भारत की राजभाषा बनाने पर सहमति बनी थी। इसके बाद हिंदी हमारी राजभाषा बन गई थी।
अध्यापिका सोनिया ने कहा कि हिंदी भाषा को हम आसानी से समझ सकते हैं। अब मांग भी उठने लगी है कि कार्यालय में हिंदी भाषा के माध्यम से ही पत्राचार किए जाने चाहिए। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सबको सहयोग करना चाहिए।
हिंदी पहचान है हिंदुस्तान की
भाषा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। भाषा के बिना समाज गूंगा और बहरा होता है। भाषा ही अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा साधन है। भाषा की प्रगति के बिना राष्ट्र की प्रगति की संकल्पना नहीं की जा सकती। विकसित देशों के विकास में उनकी भाषा का उल्लेखनीय योगदान रहा है।
स्वतंत्रता के बाद हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा दिया। इसलिए हिंदी भारतवासियों के लिए मात्र भाषा ही नहीं, बल्कि एक संस्कृति भी है। देश की राष्ट्रीय अस्मिता भी हिंदी से जुड़ी है, लेकिन विडंबना है कि देवभाषा संस्कृत से निकली हुई भारत की धरोहर हिंदी भाषा दुर्दशा की शिकार हुई।
हिंदी की इस दुर्दशा के लिए कोई और नहीं हम सब जिम्मेदार हैं। देश की व्यवस्था और अंग्रेजी के प्रति श्रेष्ठता बोध ने हिंदी को प्रभावित किया। उदारीकरण से भी हिंदी को आघात पहुंचा है। भले ही आज देश में हिंदी बोलने वालों की संख्या अधिक हो लेकिन भारतीयों की मानसिकता पर अंग्रेजी का वर्चस्व है। 14 सितंबर दी दिवस मनाकर हम इसके वजूद को कायम रखने का प्रयास करते हैं।
- सोहन लाल गौड़, प्रधानाचार्य।