पूंडरी। आचार्य पंडित रवि दत्त शास्त्री श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि तीज पर्व के महत्व पर प्रकाश डाला। इस तिथि पर पंडित ने बताया कि यह पर्व मां-पार्वती के शिव से मिलन की स्मृति में मनाया जाता है। सुहागिन स्त्रियां इस व्रत को बहुत महत्व देती हैं। वे मेहंदी लगाकर विशेष शृंगार करती हैं और अपने मायके में शिव-पर्वती की विधिवत ढंग से पूजा कर अपने-अपने सुहाग की लंबी आयु की कामना करती हैं। सनातन धर्म में देखा जाए तो हर त्योहार व्रत का अर्थ होता है। वैवाहिक जीवन में किसी कारणवश मनमुटाव हो गया हो, पति पत्नी में एक-दूसरे के प्रति कटुता पैदा हो गई हो। तो उसे अध्यात्मिकता जगाकर समाप्त करने के लिए ही इस व्रत, त्योहार का विधान किया गया है। इसे गृहस्थ आश्रम को मजबूती मिलती है, देखा जाए तो गृहस्थाश्रम ही अन्य सभी आश्रमों का आधार है। सावन के महीने में प्रकृति के प्रभाव से संपूर्ण जगत में मादकता का संचार होने लगता है, इसी महीने में हरियाली चुनर ओढ़ कर तीज का त्योहार आता है। संवाद