बेटियों को असवसर मिले तो वे निश्चित ही आसमां छू लेती हैं। यही कुछ चरितार्थ कर रही हैं आज जिले में प्रशासनिक तंत्र में धुरी का काम कर रही महिला अधिकारी। जिले में कार्यरत दो महिला अधिकारी तो ऐसी हैं, जिनके भाई नहीं हैं। लेकिन दोनों ही अधिकारियों ने चार-चार बहनें होते हुए माता-पिता की प्रेरणा से लग्न से सफलता हासिल की। आज परिवार की जिम्मेवारी के साथ-साथ कैथल में अपने-अपने विभागों की जिम्मेवारी भी बखूबी संभाले हुए हैं।
खुद के चरित्र और खुद पर विश्वास हो तो कोई आंख नहीं उठा सकता
मेरे पिता प्रो. सरदार बलबीर सिंह पटियाला में प्रोफेसर थे। हम चार बहनें हैं। भाई नहीं है। इसके बावजूद हमारे पिता ने हमें लड़कों की तरह पाला, पढ़ाया। मैंने अपनी शिक्षा पटियाला एवं चंडीगढ़ में की। हमने वो सारे काम बखूबी किए, जो लड़के परिवार के लिए कर सकते हैं। आज मैं अपनी बहनों के साथ जीवन मेें सफलता हासिल कर पाई हूं तो अपने माता-पिता के आशीर्वाद, उनकी सकारात्मक सोच एवं उचित मार्गदर्शन की वजह से। ऐसा नहीं है कि लड़के ही माता-पिता की सेवा करते हैं। लड़कियों को मौका मिले तो वे लड़कों से ज्यादा संवेदनशीलता के साथ यह काम कर सकती हैं। मैंने अपने माता-पिता को अपने पास रखा। उनकी सेवा की। आज मेरी माता जी हैं, मैं उन्हीं के साथ रहती हूं। मेरी दो बेटियां हैं। मैं भी उन्हें अपने माता-पिता की तरह से पूरे प्यार एवं लग्न से पढ़ा रही हूं। बेटियां हर तरह की जिम्मेवारी सही ढंग से संभाल सकती हैं। क्योंकि सफल होने के बावजूद घर की जिम्मेवारी तो उनकी कोई बंटवाता नहीं है। इसीलिए ड्यूटी और परिवार को भी संभाले रखना, ये काम केवल बेटियां कर सकती हैं। समाज में छेड़छाड़ या फिर अन्य अप्रिय घटनाओं को रोकने का एकमात्र रास्ता ये है कि बेटी को चरित्र और खुद पर पूरा विश्वास होना चाहिए। जहां उनका विश्वास कम हुआ, वहां असामाजिक तत्व हावी होते हैं। विश्वास रखें, ज्यादतियों का मुंह तोड़ जवाब दें तो निश्चित तौर पर सिर उठाकर सफल हो सकेंगी।
कमलप्रीत कौर। एसडीएम, गुहला-चीका।
मौका मिले तो बेटियां छू लेती हैं आसमान
2. हम चार बहनें थीं। एक स्वर्गवासी हो गई हैं। अब तीन बहनें हैं। भाई नहीं है। लेकिन हमारे माता-पिता ने हमें बेटों से भी बढ़कर लाड-प्यार दिया। जिसका नतीजा है कि आज हम जीवन में सफल हैं। मैंने अपनी शिक्षा हिसार से पूरी कीं। मेरे पिता डा. इकबाल सिंह जी चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय हिसार में वरिष्ठ वैज्ञानिक रहे हैं। उनके आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन का परिणाम है कि मेरी एक बहन नोएडा में महामाया बालिका इंटरकॉलेज में प्रिंसिपल हैं। दो बहनें गृहिणी रही हैं। मेरी सफलता में मेरे ससुराल पक्ष सहित मेरे पति का अहम योगदान रहा है। वे पानीपत में ड्रग कंट्रोल ऑफिसर हैं। विवाह के 10 बाद एलाइड सर्विसिज की परीक्षा दी। उसमें सफलता हासिल कीं। एक बात जरूर है कि बेटियों को बेटों से कम नहीं समझना चाहिए। उन्हें मौका मिले तो वे कोई भी सफलता हासिल कर सकती हैं। बेटियां निश्चित तौर पर घर की रौनक हैं। वे कमजोर नहीं हैं। समाज में सोच में बदलाव के लिए जरूरी है कि माता-पिता अपने बेटों को समझाएं कि जैसा वे सड़क पर अपनी बहन को सुरक्षित निकलना देखना चाहते हैं, हर लड़की के बारे में विचार करें कि वह भी किसी की बहन है। बेटी है। निश्चित तौर पर वक्त बदला है। अभी सोच में ओर बदलाव की आवश्यकता है।
मोनिका मलिक, डीएफएससी, कैथल।
3.
खुद की सोच में बदलाव से होगा समाज में बदलाव
मैं चंडीगढ़ में पली बढ़ी हूं। मेरी स्कूलिंग चंडीगढ़ के सेक्टर 16 स्थित विद्यालय से हुई। इसके बाद डीएवी कॉलेज चंडीगढ़, पीजीआई रोहतक एवं बाद में पीजीआई चंडीगढ़ में शिक्षा हासिल की। मेरे पिता डा. केएल पारसी आई सर्जन रहे हैं। हम चार बहनें और एक भाई हैं। लेकिन मेरे माता-पिता ने कभी लड़का-लड़की में भेदभाव नहीं किया। उन्होंने हमें लड़कों से भी बढ़कर लाड-प्यार दिया। उनका ही आशीर्वाद था कि मैंने 25 साल की उम्र में अपनी अधिकतर पढ़ाई पूरी कर ली थी तथा वर्ष 1985 में स्वास्थ्य विभाग में ज्वाइनिंग ली थी। मेरी तीन बहनों में एक बहन लेक्चरर हैं, एक डेंटल सर्जन हैं तो एक बहन दिल्ली में आर्किटैक्ट फर्म चला रही हैं। 2009 में विभाग में बतौर सिविल सर्जन पदोन्नति मिली। इसके बाद करनाल, जींद, कुरुक्षेत्र एवं अब कैथल में बतौर सीएमओ नियुक्त हूं। बेटियों की सफलता के लिए सबसे बड़ा योगदान परिवार का रहता है। हांलाकि पहले के मुकाबले अब असुरक्षा ज्यादा बढ़ी है। लेकिन लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी। तभी समाज में समानता की भावना आएगी। यह धीरे-धीरे हो रहा है।
डॉ. वंदना भाटिया, सीएमओ, कैथल।
जागरूकता अभियान का असर है, लेकिन सोच भी बदलने की जरूरत
मेरी स्कूलिंग रोहतक जिले के गांव इस्माइला से हुई। इसके बाद रोहतक से ही एमए, एमफिल और पीएचडी तक पढ़ाई की। बाद में इक्नॉमिक्स की लेक्चरर भी रहीं। लेेकिन मेरा मकसद ऑफिसर बनना था। इसीलिए वर्ष 2003 में लगातार प्रयासों, मेहनत एवं लग्न से यह सफलता मिली और एचसीएस में पास हुई। मेरे कैरियर, पढ़ाई व यहां तक पहुंचने में मेरे माता-पिता का पूरा सहयोग एवं मार्गदर्शन रहा। विशेष रुप से मां ने पढ़ाई के लिए हम तीनों बहनों एवं एक भाई को हमेशा प्रेरित किया। मेरी एक बहन चंडीगढ़ हाईकोर्ट में अधिवक्ता हैं। दूसरी बहन लेक्चरर हैं और भाई इंजीनियर है। हमारे माता-पिता ने बेटा और बेटी में कोई फर्क नहीं किया। सभी को समान रुप से पढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्हें भी बेटियों को बाहर भेजने एवं ज्यादा पढ़ाने पर समाज की बातें सुननी पड़ी। लेकिन उनकी यह ऊंची सोच थी कि हमें समान अवसर दिया और आज सभी अपने जीवन में सफल हैं। बेटियां किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। आज बेटियों के लिए ज्यादा अवसर हैं। समाज में जागरूकता आई है। हर व्यक्ति बेटियों को पढ़ाने का प्रयास कर रहा है। सरकार भी सहायता कर रही है। सुरक्षा को लेकर समाज की सोच में विकृति के कारण दिक्कतें आई हैं। हमें बेटियों की सुरक्षा के लिए पूरे समाज की सोच बदलनी होगी। अपने गांव, मोहल्ले, कस्बे की बेटी को बहन मानना होगा। जिसकी शुरूआत अपने आप से करनी होगी। बेटा-बेटी में भेदभाव ना हो। बेटियों को पढने एवं आगे बढ़ने का पूरा अवसर दें। वे जरुर आसमां छू लेंगी।
डा. शुभिता ढाका, एमडी शुगर मिल, कैथल।