कैथल। ओडिशा में आयोजित जूनियर ताइक्वांडो चैंपियनशिप में जिले की भतेरी ने पदक जीता तो साथी खिलाड़ियों और परिजनों ने जमकर खुशिया मनाई लेकिन इसके पीछे उस खिलाड़ी के संघर्ष की लंबी दास्ता है। घरवालों ने उसका नाम जब भतेरी रखा था तो किसी ने न सोचा था कि वह घर वालों का नाम फक्र से ऊंचा करेगी लेकिन यही सच है। मेहनत का पसीना जब सफलता का रंग दिखाता है तो नाम की चमक दिखने लगती है और कहते भी हैं कि सोना तपने के बाद और निखर जाता है।
पिता राजपाल ने बताया कि पुराने समय से चली आ रही परंपरा के अनुसार पहले घर में बेटी के पैदा होने पर खुशियां नहीं मनाई जाती थी। जब मेरे घर पर तीसरी बेटी हुई तो मेरे माता-पिता बोले की हे भागवान बस भतेरी हो गी, इब ओर नी चाहिए। इसलिए उन्होंने इस बेटी का नाम ‘भतेरी’ रख दिया था। उन्होंने बताया कि लड़के की चाह फिर भी रही। इसके बाद चौथी बेटी फिर पैदा हुई तो राजपाल के माता-पिता फिर बोले कि भगवान इब तो मन भर गया म्हारा, बस कर। तो उन्होंने चौथी बेटी का नाम ‘मनभरी’ रख दिया। इसके बावजूद लड़के की चाह खत्म न हुई।
राजपाल बताते हैं कि इस प्रकार बेटे के लालच में मुझे भगवान ने सात बेटियां दी और बाद में एक ल़ड़का। सबसे छोटी सातवीं बेटी को मेरे भाई ने पैदा होते ही गोद ले लिया क्योंकि उसके कोई औलाद नही थी। राजपाल बोले कि बेटी भतेरी बहुत मेहनती है। वह खेल में कठिन अभ्यास करती है। उसने ताइक्वांडाें में राष्ट्रीय स्तर पर खेल कर हमारा व देश का नाम रोशन कर दिया है। इसकी हमें बहुत खुशी है। हमें उस पर बहुत गर्व है। हमारा सपना है कि वह देश के लिए खेले ओर पदक जीते। अब हमारी बेटियां ही हमारे लिए सब कुछ है। अब हॉल ही में उसने राज्य स्तर पर स्वर्ण जीता ओर राष्ट्रीय ताइक्वांडो सीनियर चैंपियनशिप में बिहार को हरा कर कांस्य पदक जीता व विश्व ताइक्वांडो प्रतियोगिता के लिए क्वालीफाई कर लिया है।
भतेरी ने कहा कि पिता राजपाल मजदूरी करते हैं, लेकिन कभी-कभी दिहाड़ी नहीं मिलती है। वह सात बहन भाई हैं। परिवार बड़ा है ओर इतने बड़े परिवार में गुजारा करना बहुत मुश्किल है। हमारा मकान भी कच्चा ओर बारिश में छत पानी गिरता है। बड़े संघर्षशील जीवन में खेल के साथ साथ वह पढ़ाई में भी मेहनत कर रही है। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के बावजूद वह मेहनत कर रही है। खेलों में एंट्री फीस बहुत ज्यादा होती है जिसे परिवार बड़ी मुश्किल से भरते हैं। कुछ कोच देते हैं पर बाद में उनके उधार लिए पैसे वापस देने पड़ते हैं व फेडरेशन खेलों की छात्रवृति भी आती ही नहीं। जिससे ग्रेडशन की भी समस्याएं आती हैं। संवाद
एंट्री फीस भरने के लिए सहेली ने की थी मदद
विश्व ताइक्वांडो प्रतियोगिता में क्वालीफाई करने वाली राष्ट्रीय ताइक्वांडो खिलाड़ी भतेरी को प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए एंट्री फीस भरने के लिए सहेली ने मदद की थी। इसी के बाद उसने सफलता की राह पर जो कदम रखा, वह अब इतिहास है।
भतेजी बताती हैं कि आरकेएसडी कॉलेज बी कॉम प्रथम वर्ष की छात्रा है। वह पिछले 2022 के अंत से ताइक्वांडो खेल रही हैं। लेकिन ताइक्वांडो खेल से पहले बेटी भतेरी ने छठी कक्षा से वुशू खेल से अपनी शुरुआत की थी। इसमें उसने राज्य स्तर पर भाग लेकर पदक सात पदक जीते। वुशू खेल में कोई स्कोप न मिलने के कारण उसने यह खेल नौवीं कक्षा तक खेला ओर फिर घर वालों ने मेरा खेलना छुड़ा दिया। इसके बाद कोरोना काल लग या था और मैं लगभग डेढ़ वर्ष तक इंतजार करती रही। इसके बाद मैं ताइक्वांडो में हाथ आजमाया।
मैंने घरवालों से कहा कि मुझे चिल्ड्रेन पार्क में अभ्यास के लिए भेज दो। वे बड़ी मुश्किल से राजी हुए तो मैं अपनी बहन के साथ सुबह चिल्ड्रेन पार्क में निरंतर अभ्यास करने जाने लगी। इसके बाद पढ़ाई के लिए मैं स्कूल जाती थी। इसके बाद मैंने सहेली व अन्य खिलाड़ियों के साथ खानपुर स्थित खेल स्टेडियम में अभ्यास करना शुरू किया। वहां जूडो कोच चेतन शर्मा ने मेरा बहुत सहयोग किया। स्टेडियम में लगभग सात महीने तक शाम को रोजाना तीन घंटे निरंतर अभ्यास किया।
इस बीच जानकारी मिली कि वर्ष 2022 के अंत में राष्ट्रीय किक बॉक्सिंग प्रतियोगिता होनी है। कोच के सहयोग से मुझे इस खेल में हिस्सा लेने की इजाजत घर से मिल गई लेकिन एंट्री फीस बहुत ज्यादा थी। यह पांच हजार की रुपये थी। मैंने घर वालों को इस बारे में नहीं बताया क्योंकि डर था कि मुझे फिर प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की इजाजत नहीं मिलेगी। तब मेरी सहेली ने मेरी मदद की। इसके बाद मैंने चंडीगढ़ में राष्ट्रीय किक बॉक्सिंग के दो इवेंटों मे हिस्सा लिया। यहां एक स्वर्ण व एक रजत पदक मैंने जीता। इस सफलता पर मुझे स्कूल में सम्मानित किया गया। अब वह खेल महाकुंभ में तीन इवेटों में हिस्सा लेगी।