वर्ष 1965 व 1971 के युद्ध में दुश्मन के छक्के छुड़ा चुके पूर्व सूबेदार सरदारा सिंह अपने ही देश में सिस्टम से नहीं लड़ पा रहे हैं। करीब दो दशक तक लड़ाई लड़ने के बाद अब वे हारने लगे हैं और फैसला कर लिया है कि यदि सुनवाई नहीं हुई तो युद्ध में बहादुरी के लिए राष्ट्रपति द्वारा दिया गया गेलेंट्री अवार्ड लौटा देंगे। इसके बावजूद भी सुनवाई नहीं हुई तो अगला कदम उठाएंगे।
सूबेदार सरदारा सिंह ने बताया कि उन्होंने 1965 व 1971 के युद्ध में देश के दुश्मनों को करारा जवाब दिया था। उनके अधिकारियों ने हेलीकॉप्टर से उतरकर शाबाशी दी थी। एक बार तो उनका नाम वीर चक्र के लिए भी फाइनल हुआ था। लेकिन न जाने क्यूं बाद में उन्हें गेलेंट्री अवार्ड दिया गया। वर्ष 1986 में वे सेवानिवृत्त हो गए। इसी बीच उनके राजौंद स्थित घर को पीडब्ल्यूडी विभाग ने बिना किसी मुआवजा दिए तोड़ दिया। उन्होंने सेवा में रहते हुए ही वर्ष 1985 में अंबाला रोड पर 300 गज का प्लाट खरीदा था। इसमें वर्ष 1992 से 1995 के बीच 4 कमरे बनाकर इसमें मीटर लगवा दिया और परिवार सहित यहां रहने लगे। इसी बीच 2002 में हुडा ने यहां सेक्टर के लिए जमीन अधिग्रहण हेतु उन्हें नोटिस दिया। जबकि उनका मकान नोटिस से करीब 10 साल पहले का बना हुआ था। हुडा के अधिकारी भी उनकी बात को सही मानते हुए मकान को अधिग्रहण योग्य नहीं मानते थे। लेकिन इसके बावजूद उनके मकान का अधिग्रहण कर लिया गया। जबकि यहां 62 ऐसे ही मकानों को छोड़ दिया गया। उन्होंने कहा कि वह हुडा के अधिकारियों, राज्यपाल, राष्ट्रपति सहित प्रधानमंत्री को भी अपनी पीड़ा भेज चुके हैं। लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
सैनिक हूं... इसलिए यहां भी किया संघर्ष
सरदारा सिंह बताते हैं कि सेना में रहते हुए दुश्मनों से लड़ा। इसके बावजूद राजौंद में उसके मकान को तोड़ दिया गया। अब यहां भी जीवन भर की पूंजी से बनाए गए मकान को छीना जा रहा है। यहां अब सिस्टम से लड़ाई हारने लगा हूं। कैसे लड़ूं 75 साल की उम्र में...। किस को क्या बताऊं कि मैंने आजीवन देश की सेवा की, आज मुझ से सिर की छत तक छीनी जा रही है।
सरदारा सिंह के पुत्र सुरेंद्र ने कहा कि हुडा के इस फैसले से परिवार आहत है। वे सभी परेशान हैं।