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डीईओ से लेकर डीसी तक के किए फर्जी साइन

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जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में वर्ष 2006 से प्राइवेट स्कूलों को मान्यता देने के मामले में बड़ा खेल खेला जा रहा है। इस खेल के खिलाड़ी बिना आधिकारिक क्षमता के खुद के तो हस्ताक्षर करने में पीछे नहीं हटे, अलबत्ता डीईओ व डीसी तक को नहीं बख्शा और उनके भी फर्जी हस्ताक्षर करके धड़ाधड़ मान्यताएं दी गईं। यह खुलासा सीएम विंडो में शिकायत के बाद तीन सदस्यीय जांच कमेटी द्वारा की गई जांच में हुआ है। जांच रिपोर्ट आवश्यक कार्रवाई के लिए सीएम विंडो में भेज दी गई है। अब देखना यह है कि विभाग इस पूरे घालमेल में क्या कदम उठाता है?
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कैथल से आरटीआई एक्टिविस्ट जगरुप ढुल ने विभाग में मार्च 2020 में सीएम विंडो पर शिकायत दी थी। जिसकी जांच के लिए तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी ने डीपीसी सुदेश सिवाच, डिप्टी डीईओ प्रेम पूनिया व जाखौली अड्डा स्कूल के प्रिंसिपल पवन गर्ग की तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनाई थी। जांच कमेटी ने सभी बीईओ के माध्यम से उनके अधिकार क्षेत्र में चल रहे स्कूलों की मान्यता संबंधी प्रमाण पत्र मंगवाए। साथ ही जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में संबंधित ब्रांच से इन स्कूलों की मान्यता प्राप्ति के लिए जमा फाइलें मंगवाई। जिसमें अधिकतर स्कूलों की फाइलें तक नहीं मिलीं। कइयों के जो प्रमाण पत्र सामने आए, उनमें फर्जी, संदिग्ध व बिना अधिकारों के कर्मचारियों द्वारा हस्ताक्षर करना पाया गया। करीब 42 स्कूलों की मान्यता पर सवाल उठाते हुए जांच कमेटी ने आगामी कार्रवाई के लिए रिपोर्ट जमा करवा दी है। साथ ही रिपोर्ट की प्रति शिकायतकर्ता जगरुप ढुल को भी दी गई। जगरुप ढुल ने इस जांच रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों की जानकारी दी।
डीसी व डीईओ के फर्जी साइन- आईएएस एनके सोलंकी ने कैथल में बतौर डीसी 15 जुलाई 2013 को ज्वाइन किया था और 25 नवंबर 2014 तक कैथल के डीसी रहे। लेकिन स्कूल की मान्यता संबंधी फाइलों पर 31 अक्तूबर 2012, 12 अप्रैल 2013, 21 मई 2013, 15 अक्तूबर 2015 की तिथियों में उनके हस्ताक्षर पाए गए। जिससे स्पष्ट है कि उनकी ज्वाइनिंग से पहले और उनके कैथल से तबादले के बाद तक भी फाइलों पर उनके हस्ताक्षर किए गए। कमेटी ने जांच में यह भी पाया कि फाइलों पर जो तत्कालीन डीसी के साइन हैं, वे उनके ओरिजिनल साइन से मैच नहीं करते। जिससे बड़ा फ्राड की आशंका है।
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इसी प्रकार से वर्ष 2006 में कैथल में डीईओ रहे राजेंद्रपाल सिंह से कमेटी कुरुक्षेत्र में जाकर मिली। जो इस समय रिटायर हो चुके हैं, उन्होंने अपने ब्यान में कहा कि उनके सामने जो 15 विद्यालयों की मान्यता की प्रतियां प्रस्तुत की गई हैं, उन पर उनके हस्ताक्षर नहीं हैं। इन विद्यालयों की फाइल भी कमेटी द्वारा बताया गया है कि कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। इस तरह से स्पष्ट है कि फर्जीवाड़े में शामिल लोग स्कूल संचालकों के साथ मिलकर डीईओ व डीसी तक के फर्जी साइन करने से नहीं हिचकिचाए।
अधिकतर स्कूलों की फाइल ही नहीं -जांच के दायरे में आए करीब 42 स्कूलों में से अधिकतर की मान्यता के लिए आवेदन करने संबंधी कोई फाइल ही डीईओ कार्यालय में नहीं मिली। इसके अलावा वर्ष 2006 से 2015 तक का डिस्पैच रजिस्टर भी जांच कमेटी को नहीं मिला। फाइल व रजिस्टर के लापता होने पर सवाल उठता है कि विभाग ने पहले रिकॉर्ड लापता होने की सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी। सूत्रों के अनुसार कई स्कूलों ने तो मान्यता के लिए फाइल ही नहीं बनाई, केवल फर्जी मान्यता प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया। जिस पर लापता रजिस्टरों मेें दर्ज डिस्पैच नंबर लगाए गए हैं। एक सोची-समझी साजिश के तहत डिस्पैच रजिस्टर ही लापता किए गए हैं।
कर्मचारी ने माना नहीं भेजी इंस्पेक्शन के लिए नहीं भेजी फाइल-जांच कमेटी की जांच में यह भी सामने आया कि कई स्कूलों की मान्यता से पहले इंस्पेक्शन नहीं की गई। ना ही इंस्पेक्शन के लिए कोई फाइल प्रस्तुत की गई। जिससे स्पष्ट है कि बिना इंस्पेक्शन के ही मान्यता का प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया। शिकायतकर्ता जगरुप ढुल ने कहा कि जांच रिपोर्ट उन्होंने सीएम विंडो से ऑनलाइन अपलोड की है। जांच टीम में शामिल डिप्टी डीईओ प्रेम पूनिया ने कहा कि जांच कमेटी ने रिपोर्ट डीईओ कार्यालय में दे दी थी। आगे उस रिपोर्ट को किसे दिया गया और उस पर क्या कार्रवाई हुई? उस बारे में उन्हें कुछ नहीं पता। वहीं डीईओ अनिल शर्मा ने कहाकि जांच रिपोर्ट सीएम विंडो पर भेज दी गई है। मैंने जांच रिपोर्ट नहीं पढ़ी है, उसमें क्या लिखा है।
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