संवाद न्यूज एजेंसी
कलायत। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सहयोग से ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी (जीईएफ) परियोजना के तहत धान-गेहूं उत्पादन करने वाले चार राज्यों में फील्ड कार्यक्रम आयोजित किए। इस क्रम में एफएओ के क्षेत्रीय कार्यालय, बैंकाक की टीम ने देश के एग्रोनॉमिस्ट टीम के साथ गांव बात्ता के खेतों का दौरा किया। इस दौरान स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. रमेश चंद्र वर्मा और डा. अमित कुमार भी उनके साथ मौजूद रहे।
विशेषज्ञ टीम ने किसानों से मुलाकात कर सतत धान उत्पादन पद्धतियों की प्रगति का मूल्यांकन किया और जमीनी स्तर पर आने वाली चुनौतियों को समझा। दौरे का मुख्य फोकस धान की सीधी बिजाई, कीट प्रबंधन और पोषक तत्व प्रबंधन जैसी सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने पर रहा। इन तकनीकों को पर्यावरणीय क्षरण कम करने, जल संरक्षण बढ़ाने और मृदा स्वास्थ्य सुधारने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
किसानों ने एफएओ और भारत सरकार से तकनीकी समाधान और सहायता की मांग की, जिसमें विशेष रूप से धान की सीधी बिजाई में खरपतवार नियंत्रण और पौध स्थापना पर ध्यान देने का अनुरोध शामिल है। डा. रमेश चंद्र वर्मा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिकों के भारत दौरे से प्राप्त फीडबैक जीईएफ-7 परियोजना के तहत भारतीय किसानों को भविष्य में बेहतर तकनीक उपलब्ध कराने में मदद करेगा। यह पहल सतत कृषि, पर्यावरण संरक्षण और खाद्य सुरक्षा के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।
धान की सीधी बिजाई में खरपतवार नियंत्रण प्रमुख चुनौती
किसानों से बातचीत के दौरान डा. मैथ्यू और जितेंद्र जायसवाल ने इन पद्धतियों के लाभों और सीमाओं पर जानकारी साझा की। उनके अनुसार, डीएसआर (धान की सीधी बिजाई) में खरपतवार प्रबंधन एक प्रमुख चुनौती है और यह तकनीक को व्यापक रूप से अपनाने में सबसे बड़ी बाधा बन रही है। इसके अलावा बीज अंकुरण और पौध स्थापना की समस्याएं भी उन खेतों में देखी गईं जो लेजर लेवलिंग से समतल नहीं हैं। डा. मैथ्यू ने बताया कि असमान खेतों में जल वितरण असंतुलित हो जाता है, जिससे अंकुरण और पौध स्थापना प्रभावित होती है और कई बार किसान पारंपरिक धान बिजाई पर लौट जाते हैं। इसके बावजूद किसानों में पारंपरिक खेती के दीर्घकालीन प्रभावों के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। कई किसानों ने मृदा स्वास्थ्य में गिरावट, भूजल स्तर में कमी और पर्यावरण प्रदूषण को गंभीर चिंता के रूप में माना है।