कैथल। ऐतिहासिक सूर्यकुंड डेरे के काली माता के मंदिर में चैत्र नवरात्र पर्व पर लगे मेले में लगभग एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने माथा टेक मन्नत मांगी। मेले को लेकर श्रद्धालु मंगलवार शाम से समय ही पहुंचना शुरू हो गए थे।
इस मौके पर जगह-जगह भंडारों का आयोजन किया। मेले को लेकर पुलिस प्रशासन की तरफ से भी कड़े प्रबंध किए। मेले में सुरक्षा व्यवस्था के तहत 50 पुलिसकर्मी व 200 सेवादारों को व्यवस्था बनाने के लिए लगाया है। मेले के दौरान सीवन गेट, अर्जुन नगर व शहर के कमेटी चौक से मंदिर की तरफ आने वाले रास्तों के लिए वाहनों की एंट्री बंद की गई थी। इस दौरान पैदल चलने वाले श्रद्धालुओं की काफी भीड़ रही।
यह मेला शाम 4 बजे तक जारी रहा। मंदिर के महंत रमनपुरी ने बताया कि मेले को लेकर कड़ी व्यवस्था की गई है। यहां पर दूर दराज से श्रद्धालु माता के दरबार में पहुंच रहे हैं।
मंगलवार शाम से ही श्रद्धालु आना शुरू हो गए थे। रात के समय में लाखों श्रद्धालु मंदिर परिसर में ही ठहरे थे। सुबह चार बजे से ही श्रद्धालुओं ने मंदिर की लाइनों में लगकर पूजा अर्चना शुरु कर दी थी। शाम चार बजे तक श्रद्धालुओं की पूजा अर्चना की प्रक्रिया जारी रही। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, यूपी सहित अन्य राज्यों से भी बाजीगर समुदाय के लोग पहुंचे। इसके साथ ही मंदिर परिसर के चारों और भव्य तरीके से मेला भी लगाया गया।
मेले बच्चों ने झूलों पर झूलकर खूब आनंद लिया और खेलने के लिए काफी खिलौनों की भी खरीदारी की।
ये है मंदिर का इतिहास
मंदिर के महंत रमनपुरी ने बताया कि डेरे में स्थित काली माता का मंदिर काफी प्राचीन है। इसकी काफी मान्यता है। रमनपुरी ने बताया कि आजादी से पहले बाजीगर समाज के बुजुर्ग कलवा पीर महाकाली के परम भक्त होते थे। वह लाहौर में रहते थे।
सैंकड़ों वर्ष पहले की बात है कि एक समय वह मां काली की आराधना कर रहे थे। उस समय जब वे रात के समय सोए तो मां काली ने उन्हें सपने में दर्शन दिए। दर्शन देकर कहा कि उन्हें सुबह एक बकरा दिखेगा। उस बकरे के साथ चलना। जहां पर भी यह बकरा जाकर रुक जाए तो वहां पर ही मेरा मंदिर बनाकर पूजा-अर्चना करना।
माता की बताई गई बातों के अनुसार बकरा सूर्यकुंड डेरे में आकर रुका। इसके बाद से ही कलवा पीर यहां पर आकर बस गए। इस समय भी कलवा पीर की समाधि बनी है और धूणा भी लगा है। तभी से लेकर बाजीगर समाज की कुलदेवी का मंदिर यहां पर ही बन गया। आजादी से पहले पाकिस्तान में रहने वाले बाजीगर समाज के लोग भी यहां पर नवरात्र में पूजा-अर्चना करने के लिए पहुंचते थे। रमनपुरी ने बताया कि बाजीगर समाज में माता काली के मंदिर में माथा टेकने के बाद ही समाज के युवा व युवतियां अपने दांपत्य जीवन की शुरुआत करते हैं।