शहरी विकास मंत्रालय की टीम ने स्मार्ट सिटी की दौड़ में कैथल की स्थिति के लिए दो दिन में अपना सर्वे पूरा कर लिया। बाजारों व रिहायशी इलाकों में सामूहिक व सार्वजनिक शौचालय, कई इलाकों में साफ-सफाई सहित कुछ अन्य खामियों से शहर के अंक कट सकते हैं। मंत्रालय द्वारा निर्धारित 2000 अंकों में अलग-अलग मद निर्धारित किए गए हैं। जिनके अनुसार टीम में शामिल अधिकारियों ने शहर का दो दिनों तक सर्वे किया।
वीरवार को टीम के अधिकारी दो खेमों में बंट गए। दो अधिकारियों ने नगर परिषद कार्यालय में बैठकर कागजी रिकॉर्ड की जांच की। परिषद द्वारा जागरूकता अभियान के दौरान के कागजातों, लोगों को दिए गए प्रमाण पत्रों सहित अन्य जानकारियां हासिल की। साथ ही कर्मचारियों की संख्या, उपलब्ध मशीनों व अन्य संसाधनों का ब्योरा भी जुटाया। दोपहर बाद तक चली इस कार्रवाई में कर्मचारियों ने कई कार्यों की मौके पर ही रिपोर्ट बनाकर प्रस्तुत की।
दूसरी खेमे में शामिल अधिकारियों ने वार्ड नंबर 1 और 2 की अर्जुन नगर व अन्य गलियों, कुतुबपुर रोड पर स्थित हरीनगर, शोरगिर बस्ती, अमरगढ़ गामड़ी, अंबेडकर कॉलोनी, ढांड रोड स्थित कालोनी, नेहरू गार्डन में घरों में जाकर शौचालय बनवाए जाने, उसकी प्रक्रिया एवं इसके लिए सरकार द्वारा दी गई राशि की जानकारी हासिल की।
कई जगह कम राशि मिली
अधिकारियों को वार्ड के लोगों ज्योति, सचिन, मोहित आदि ने बताया कि उन्हें शौचालय बनाने के लिए 14 हजार की बजाए 7 हजार रुपये की राशि दी गई। आधी राशि उन्हें अभी तक नहीं मिली।
सार्वजनिक व कम्यूनिटी शौचालय नहीं मिले
अधिकारियों ने मेन बाजार, अनाज मंडी व जनता मार्केट सहित कई जगहों का दौरा कर सार्वजनिक व सामूहिक शौचालयों की जानकारी हासिल की। कई जगह शौचालय नहीं मिले। जबकि बाजार व कई रिहायशी इलाकों में सार्वजनिक शौचालय होने चाहिए। कई जगह जागरूकता पोस्टर भी नहीं मिले। जबकि स्वच्छता अभियान के तहत ये पोस्टर लगाए जाने जरूरी हैं। इस खामी से सर्वे में शहर के अंक कट सकते हैं। सर्वे टीम में ऑडिटर अशोक कुमार, बाबू लाल व सीनियर ऑडिटर योगेंद्र सहित नगर परिषद के जेई मोहित, समाज सेवी जगरूप ढुल शामिल रहे।
स्टॉफ की कमी से परेशानी
नगर परिषद में सफाई कर्मचारियों की कमी के कारण भी अंक कम हो सकते हैं। टीम द्वारा नगर परिषद से कर्मचारियों की संख्या, कचरा उठाने की प्रक्रिया, गाड़ियों की संख्या सहित तमाम तरह की जानकारियां हासिल कीं। लेकिन शहर की जनसंख्या के हिसाब से सफाई कर्मचारी ना होने के कारण स्वच्छता अभियान को झटका लग सकता है।
जीपीएस सिस्टम नहीं है
कचरा उठाने के लिए लागू की गई गाड़ियों के लिए जीपीएस सिस्टम लागू नहीं है। जिस कारण यह पता नहीं चल पाता कि कौन सी गाड़ी कहां से कचरा उठा रही है। टीम यह भी तलाश करती नजर आई कि डोर टू डोर कचरा उठाने के लिए क्या प्रबंध किए गए हैं। वहीं टीम ने कचरा डंपिंग स्टेशन का दौरा किया। जहां जमीन खराब ना हो, इसके लिए डाले जाने वाले केमिकल की जानकारी भी जुटाते नजर आए।
इस तरह से मिलेंगे नंबर
सर्वे में 900 अंक कागजी कार्रवाई, 500 अंक सर्वे रिपोर्ट, 600 अंक नागरिक भागीदारी के माध्यम से दिए जाएंगे।