कैथल। बीस साल बाद हरियाणा में किसान आंदोलन किसी एक बैनर तले एकजुट नजर आ रहा है। किसान आंदोलन हरियाणा के लिए नई बात नहीं है। अस्सी के दशक से यहां किसान अपने हकों के लिए सड़क व रेल रोको आंदोलन के बीच अपनी शहादत दे चुके हैं। पुलिस की गोली व लाठी के कारण करीब 26 से अधिक किसान बड़े आंदोलनों में मौत का शिकार हुए हैं।
वर्ष 2005 के बाद से हुए सत्ता परिवर्तन के बाद कृषि कानूनों से पहले कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ। किसान अनेकों छोटे-बड़े गुटों में बंट गए थे। लेकिन करीब 20 साल बाद संयुक्त किसान मोर्चे के बैनर तले किसान एकजुट नजर आ रहा है और शनिवार को कैथल में गांव दर गांव हुए दोपहर 12 से 3 बजे तक रोड जाम में किसानों ने बड़ी एकजुटता का परिचय दिया है। पूर्व के आंदोलनों से अलग इस आंदोलन में एक बात ओर अलग है, हरियाणा पुलिस हो या दिल्ली पुलिस, अभी तक पुलिस ने गोली ना चलाकर बड़े संयम का परिचय जरूर दिया है।
बुलंद रखा आंदोलन, पीछे नहीं हटे किसान
लंबे समय से किसान संघर्ष के गवाह किसान नेता जियालाल व अन्य बताते हैं कि हरियाणा में अस्सी के दशक में ही किसान आंदोलन शुरू हो गए थे। वर्ष 1981 में लोहारू में हुए किसान आंदोलन में किसान महावीर की जान गई थी, 1985 में बिजली के मुद्दे पर किसान आंदोलन हुआ, जिसमें घासी राम नैन को जेल हुई। 7 जनवरी 1993 में बिजली के मुद्दे पर करनाल के गांव निसिंग में कैथल जिले के किसान लखपत व मामचंद पुलिस की गोली से मौत का शिकार हुए थे। 10 अक्तूबर 1994 में धान की कीमत को लेकर टोहाना में तत्कालीन कृषि मंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज में रोहतक के प्यारे लाल एक किसान की मौत हो गई थी। 23 अगस्त 1995 में भिवानी के कादमा में बिजली काटने पर किसान आंदोलन में 5 किसान मारे गए थे। बंसी लाल सरकार में 10 अक्तूबर 1997 में महेंद्रगढ़ के मंडियाली गांव में बिजली मुद्दे पर किसान आंदोलन हुआ। जिसमें चार किसानों की गोली लगने से मौत हुई थी। इसी कांड में कैथल के खरक पांडवा से किसान नेता फतेह सिंह फतवा के जिंदा जलने की अफवाह उड़ी और पांच दिन बाद 15 अक्तूबर 1997 को कलायत में रेल रोको आंदोलन किया गया। सरकार ने जब फतवा के जिंदा होने का सुबूत दिया तब जाकर यह आंदोलन खत्म हुआ। इसके अगले दिन 16 अक्तूबर को उचाना व धमतान साहब में रेल रोक दी थी। वहां लाठीचार्ज के बाद एक किसान धमतान के रामफल की मौत हो गई थी। इन्हीं आंदोलनों में किसानों की गिरफ्तारी के विरोध में 3 नवंबर 1997 कैथल के गांव कौलेखां में रेल रोको आंदोलन में पुलिस की गोलियां चली थीं। जिसमें कौलेखां निवासी पूर्व सैनिक गोपीचंद की मौत हो गई। इसके बाद आई इनेलो सरकार में बिजली पानी निशुल्क देने के वायदे को पूरा करने के लिए फिर से किसानों ने आंदोलन का बिगुल बजा दिया। जिसमें 21 दिसंबर 2001 को बिजली काटे जाने के विरोध में कंडेला में हुई पंचायत में पुलिस ने गोली व लाठी चलाई। गोली चलने के कारण 50 से 60 लोग घायल हो गए थे।
14 अप्रैल वैशाखी के दिन भाकियू नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। जिसके विरोध में 19 मई 2002 को कंडेला में गिरफ्तारियों के विरोध में किसान महापंचायत बुलाई गई। यहां हुई गोली बारी में नगूरां में पुलिस की गोली से कैथल के गांव शिमला निवासी राम स्वरूप की मौत हो गई। इस किसान की तेरहवीं के दिन कंडेला की महापंचायत के बाद किसानों ने गांव दर गांव जाम लगाने का एलान किया। जिसमें अलग-अलग जगहों पर हुई पुलिस की गोलीबारी में 10 किसानों की मौत हुई थी। सैकड़ों घायल हुए थे। 25 नवंबर 2002 को शहजादपुर में गन्ने के बकाया पैसे को लेकर हुए आंदोलन में घासी राम नैन व फतेह सिंह फतवा गिरफ्तार कर लिए गए। इसके बाद देशद्रोह जैसे संगीन आरोपों में किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया। स्वयं भाकियू नेता जियलाल ने बताया कि उन्हें 8 अगस्त 2003 को गिरफ्तार कर लिया गया।