कैथल। पिछड़ा वर्ग एवं अनुसूचित जाति के बच्चों को आवासीय विद्यालय उपलब्ध करवाने की विभाग की पहल के बीच इंटर्नशिप कर रहे डीएड के छात्र-अध्यापक पिस कर रह गए हैं।
पहले से ही स्कूलों में बेगार झेल रहे इन अध्यापकों पर अब विभाग द्वारा जिले में खुल रहे दो आवासीय कस्तूरबा गांधी विद्यालयों में बच्चों के दाखिले के लिए जागरूकता की जिम्मेवारी डाल दी गई है।
बच्चे दाखिल भी हो जाएंगे, लेकिन इस प्रक्रिया में विभागीय नीतियों के शोषण का शिकार हो रहे इंटर्नशिप अध्यापकों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। इन विद्यार्थियों का कहना है कि वे एक तरह से विभाग के बंधुआ मजदूर बनकर रह गए हैं।
मटौर एवं सजूमा में खुलने हैं कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय
शिक्षा विभाग द्वारा कमजोर आर्थिक वर्ग, पिछड़ा वर्ग एवं अनुसूचित जाति के बच्चों को आवासीय विद्यालय मुहैया करवाए जाने के लिए कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय खोले जाने हैं। जिनके लिए इस समय भवन तैयार किए जा रहे हैं। इन स्कूलों में बच्चों के दाखिले की जिम्मेवारी शिक्षा विभाग की है। लेकिन विभिन्न कॉलेजों से डीएड कर रहे विद्यार्थियों पर बच्चों को दाखिले के लिए मोटिवेट करने की जिम्मेवारी इन पर डाल दी गई है।
जिला शिक्षण संस्थान में बुलाकर थमाया परफोर्मा
शिक्षा विभाग ने इस कार्य के लिए कलायत एवं कैथल ब्लॉक के करीब 200 से ज्यादा इंटर्नशिप कर रहे डीएड विद्यार्थियों को बुलाकर दोनों विद्यालयों में बच्चों के दाखिले के लिए माता-पिता को जागरूक करने के लिए एक-एक परफोर्मा थमा दिया गया। मंगलवार को कोई कलायत से तो कोई किसी गांव से किराया खर्च कर डाइट में पहुंचा। जहां करीब ग्यारह बजे तक तो पीने के पानी तक की उचित व्यवस्था नहीं थी।
इन बच्चों को आने-जाने तक के लिए कोई किराया अथवा खाने-पीने तक की कोई व्यवस्था नहीं थी। वहीं एक अध्यापक ने बताया कि यदि एक अध्यापक को ट्रेनिंग के लिए बुलाया जाता है तो उसे एक दिन के लिए 200 रुपये नकद एवं आने-जाने का किराया दिया जाता है। लेकिन इन बच्चों को कोई भुगतान नहीं किया जाता।
उद्देश्य अच्छा, लेकिन शोषण क्यों?
स्वयं डीएड के विद्यार्थियों का कहना है कि यह एक अच्छा है कि कस्तूरबा गांधी विद्यालय खुलें, उनमें गरीब बच्चों के दाखिले हों तथा उन्हें आवासीय सहित उचित शिक्षा मिले। लेकिन इस कार्य में यदि उनसे काम लिया जा रहा है तो यह निशुल्क क्यों लिया जाए? उन्हें इसके लिए अध्यापकों की तर्ज पर भुगतान किया जाए। सरकार स्कूल खोलकर काम अच्छा कर रही है, लेकिन उनका शोषण क्यों किया जा रहा है?
विद्यार्थियों की जुबानी उनकी परेशानी
ऐसा क्षेत्र में सर्वे के लिए कहा गया है, जहां लड़कियों को जाने में परेशानियां आएंगी। कई लोग तो सही व्यवहार नहीं करते हैं। हमें लोगों के कमेंट्स का सामना करना पड़ता है। काफी सारे लोग तो घर का दरवाजा ही नहीं खोलते हैं। इससे हमें जलील होना पड़ता है।
-पिंकी देवी, छात्रा।
इंटर्नशिप, कभी सर्वे, कभी बच्चों को दाखिला दिलवाने का जिम्मा, ये सभी कार्य हमीं से क्यों लिए जा रहे हैं? हमारे सीनियर्स को पैसे देने के लिए बैंक खाते खोले गए थे। लेकिन आज तक कुछ भी भुगतान नहीं किया गया। सरकार की नीतियों का हम प्रचार-प्रसार कर रहे हैं, लेकिन हमें वादे के अनुसार कुछ भी राशि नहीं दी जा रही।
-मोनिका, छात्रा।
कस्तूरबा गांधी और ड्रॉप आउट बच्चों के लिए फार्म भरना पड़ता है। अब हमें उसके लिए 100 घरों में भी यदि फार्म भरना होगा, तो इसके फोटोस्टेट का खर्च भी हमें ही देना होगा। इतनी गर्मी में खुद के पैसे लगाकर सर्वे करना होगा। जो किसी भी सूरत में सही नहीं है।
-ममता, छात्रा।
हम जब तीन किलोमीटर तक घर से दूर जाकर सर्वे करेंगे तो हमें हर रोज किराया देना होगा। यह पैसा कहां से आएगा? हमारे माता-पिता इस पैसे को कहां से लाएंगे। गर्मी के मौसम में यह काफी परेशानी भरा होगा। लेकिन विभाग के आदेश हैं, मजबूरन हमें करना पड़ेगा।
दीपिका, छात्रा।
पहले से ही ड्रॉप आउट बच्चों को लेकर सर्वे चल रहा है। अब कस्तूरबा गांधी स्कूलों के लिए बच्चों का सर्वे उन पर थोप दिया गया है। जबकि इससे पूर्व वे स्कूलों में इंटर्नशिप कर रही हैं। बिना किसी अध्यापक के सर्वे करना हम लड़कियों के लिए बड़ी मुसीबत से कम नहीं है। गर्मी की दोपहरी में घरों से निकलना तक लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है, हमारी बात कौन सुनेगा?
-प्रवीन, छात्रा।
लड़कियों के लिए दोपहरी में घर-घर जाने में सुरक्षा को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ता है। माता-पिता को चिंता रहती है। जो काम सरकारी कर्मचारी को करना चाहिए, वह बच्चों से करवाया जा रहा है। यदि कोई घटना होती है तो इसकी जिम्मेवारी किसकी होगी?
-शीना, छात्रा।
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स्कूलों में किया जा रहा है शोषण : संघ
हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ के नेता सतबीर गोयत का कहना है कि सरकार द्वारा पहले इंटर्नशिप के लिए बच्चों को भुगतान के निर्देश दिए गए थे, लेकिन बाद में वह भी कहीं-कहीं दिए गए। अब इनका सर्वे के नाम पर शोषण हो रहा है। विभाग यदि कोई काम लेता है तो उस हिसाब से इन बच्चोें को भुगतान किया जाना चाहिए।
उधर, जिला शिक्षा अधिकारी दयानंद आंतिल ने कहा कि मैं अवकाश पर हूं। इस बारे में जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी ही कुछ बता सकते हैं।
कोट
डाइट में बुलाने के नहीं हैं आदेश
शिक्षा विभाग की ओर से बच्चों को डाइट में बुलाने के लिए कोई आदेश नहीं हैं। उन्हें डाइट में क्यों बुलाया गया, यह जानकारी में नहीं है। लेकिन इंटर्नशिप कर रहे बच्चे दाखिले के लिए लोगों को मोटिवेट तो कर ही सकते हैं।
-सतीश राणा, जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी।
गरीब बच्चों के दाखिले के लिए दी गई जानकारी
जिला शिक्षण संस्थान के प्रिंसिपल रफिया राम का कहना है कि कस्तूरबा गांधी विद्यालय खोला जाना एक सराहनीय कदम है। इन स्कूलों में गरीब एवं जरूरतमंद बच्चों के दाखिले हो जाएं। इसके लिए गरीब माता-पिता को जानकारी देने में अन्य लोगों के साथ-साथ इंटर्नशिप अध्यापक अच्छा योगदान दे सकते हैं। इसी कारण उन्हें माता-पिता को जागरूक करने का जिम्मा सौंपा गया है। इंटर्नशिप अध्यापकों को भुगतान संबंधी फैसला विभाग द्वारा लिया जाना है। इस बारे में विभाग को पहले भी सूचित किया गया है।