अनुसूचित जाति के लोगों के उत्थान के लिए सरकार की ओर से अलॉट की गई पर कुछ लोगों ने कृषि भूमि की आड़ में गड़बड़ी सामने आई है। एसडीएम ओमप्रकाश ने अपनी जांच में इसका खुलासा करते हुए जिला उपायुक्त रविप्रकाश गुप्ता को अवगत करवाया है। इसमें संबंधित वर्ग की सरकारी भूमि मालिक सभा कलायत के खिलाफ अपने उद्देश्य से भटकने तथा अनियमितताएं बरतने पर नियमानुसार आगामी कार्रवाई करने के लिए सहायक रजिस्ट्रार सहकारी समितियां कैथल को आदेश देने की सिफारिश की है।
एसडीएम ने पत्र क्रमांक 4651 के तहत यह स्पष्ट किया है कि शिकायतकर्ता की शिकायत, समिति के प्रधान की लिखित प्रार्थना व सहायक रजिस्ट्रार सहकारी समितियां कैथल के बयान और विवादित भूमि का मौका निरीक्षण करने के उपरांत यह निष्कर्ष सामने आया है कि विवादित भूमि रकबा 537 कनाल 8 मरले कलायत में स्थित है। तत्कालीन कलेक्टर ने उक्त भूमि को संबंधित जाति की सरकारी भूमि मालिक सभा लिमिटिड कलायत को जातियों के उत्थान के लिए हस्तांतरित किया था। इस भूमि में से 106 कनाल 19 मरले सरकार द्वारा वाटर सप्लाई के लिए अधिग्रहित की जा चुकी है।
हैरानी की बात है कि अधिग्रहण की मुआवजा राशि को भी समिति के 14 सदस्यों ने आपस में बांट लिया। इसका कोई हिसाब-किताब वर्तमान समिति/कमेटी के पास नहीं है। वर्तमान मौके पर खेवट नंबर 202 में 114 कनाल 9 मरले, खेवट नंबर 422 में 240 कनाल 7 मरले, खेवट नंबर 1338 में 89 कनाल 12 मरले भूमि बरुये जमाबंदी वर्ष 2010-11 अनुसार शेष है। मुरब्बा नंबर 240 किला नंबर 10, 11 व 19 में अनेक लोगों ने अपने मकान बनाए हुए हैं। साफ है कि सरकार द्वारा वर्ष 1999 में विवादित भूमि समिति को जिस उद्दश्यों से ट्रांसफर की थी समिति उससे भटक चुकी है।
समिति के वर्तमान सदस्यों ने भूमि को 14 हिस्सों में बांट लिया है और उस पर काश्त कर रहे है। समिति द्वारा जो 5 सदस्यों की कमेटी बनाई गई है, वह अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर रही। समिति व कमेटी के पास भूमि की उपज का कोई लेखा-जोखा नहीं है। समिति/कमेटी द्वारा निर्धारित बाइलाज अनुसार कार्य नहीं किया जा रहा। समिति द्वारा जांच रिपोर्ट तैयार करने तक कोई भी आडिट नहीं करवाया गया और न ही कृषि से प्राप्त होने वाली आय की हिसाब-किताब इनके पास है। समिति द्वारा पूर्ण अनियमितताएं बरती जा रही है जिससे शिकायतकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप पूर्णत सिद्ध होते है।
डीसी से कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता विक्रम सिंह और सुरेंद्र कुमार ने कहा कि जांच से ये स्पष्ट हो गया है कि यह विशेष लोगों की मिलकियत नहीं बल्कि अनुसूचित जाति की सांझी भूमि है। सरकार की ओर से जो भूमि गरीबों के उत्थान के लिए अलाट की गई थी उसकी समुचित निगरानी का कार्य सहकारी समितियों का था। लेकिन जिस तरह जमीन से जुड़े रिकार्ड में भारी अनियमितताएं मिली हैं, उससे साफ है कि समिति अधिकारियों ने संजीदगी का परिचय नहीं दिया। फलस्वरूप वर्षों से यह सब कुछ चलता रहा।
यह बयान दर्ज कराया
सोसाइटी के प्रधान के तौर पर बनारसी बेदी ने एसडीएम के समक्ष के जो बयान दर्ज करवाए हैं उसके अनुसार वे 14 सदस्य हैं और अपनी-अपनी खेती कर रहे हैं। समिति 13 जुलाई 1957 को पंजीकृत हुई। 21 जनवरी 1999 को 70 एकड़ भूमि की रजिस्ट्री सोसाइटी के नाम हो गई। गैर मेम्बरों का इस पर कोई हक व दावा नहीं है।