संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। आस्था, अनुशासन और पवित्रता के प्रतीक सूर्योपासना के महापर्व छठ की शुरुआत शनिवार को नहाय-खाय के साथ हो गई। इस दिन व्रती महिलाओं ने चने की दाल, लौकी और भात प्रसाद के रूप में ग्रहण कर व्रत का शुभारंभ किया।
शहर में रह रहे बिहार एवं पूर्वांचल के लोगों में इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह देखा गया। सभी छठ पूजा समितियां घाटों पर बेदी और सजावट की तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटी हैं।
डेरा बाबा शीतल पुरी तालाब मंदिर परिसर में इस बार भी भव्य आयोजन होगा। मंदिर के पुजारी राजू पंडित ने बताया कि दूसरे दिन खरना की पूजा होगी, जिसमें गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण कर 36 घंटे का निर्जला व्रत आरंभ किया जाएगा। तीसरे दिन अस्ताचलगामी सूर्य और चौथे दिन उदय होते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर व्रत का समापन किया जाएगा।
उधर, नगर निगम की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सफाई और प्रकाश व्यवस्था को प्राथमिकता दी गई है। शीतल पुरी तालाब सहित अन्य घाटों पर सफाई कार्य लगभग पूरा हो चुका है और घाटों में पानी भरा जा रहा है।
छठ का महिलाओं ने बताया महत्व
प्रकृति से जुड़ने का पर्व कृतज्ञता का संदेश
छठ पर नदी, तालाब, जलाशय में अर्घ्य देने की परंपरा है, इसलिए लोगों का जुड़ाव नदियों से होता है। छठ महापर्व लोगों को प्रकृति के करीब ले जाने का पर्व है। -शकुंतला देवी
ठेकुआ के प्रसाद
की विशेष महत्ता
छठ पर सफाई की का ध्यान दिया जाता है, इसलिए प्रसाद की तैयारियों में व्रती महिलाएं खास ध्यान रखती हैं। ठेकुआ के प्रसाद की विशेष महत्ता रहती है। - सुनीता देवी
सूर्यदेव के प्रति व्यक्त
करते हैं कृतज्ञता
छठ महापर्व पूरी धरती को अपने प्रकाश से आलोकित करने वाले सूर्यदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ प्रकृति के संरक्षण का भी सभी लोग संकल्प लेते हैं। - सुधा झा
बांस से बनी डलिया लाई जाती है उपयोग में
छठ में बांस से बनी डलिया सूर्यदेव को अर्घ्य देने के उपयोग में लाई जाती है। इसमें ठेकुआ, गन्ना, सिंघाड़ा, मूली, शकरकंद, मौसमी सब्जियां और फल होते हैं। -नीलिमा चाैधरी
खरना : छठी मैया का घर में आगमन
छठ पर्व का दूसरा दिन यानी खरना, पूर्ण पवित्रता और भक्ति का प्रतीक है। ‘खरना’ शब्द का अर्थ ही होता है, शुद्धता। इस दिन व्रती स्नान कर, शुद्ध वस्त्र धारण कर और पूरे वातावरण की स्वच्छता का ध्यान रखते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन से छठी मैया का घर में आगमन होता है। खरना की पूजा करने वालों को सूर्य देव और छठी मैया का आशीर्वाद प्राप्त होता है। खरना की पूजा के बाद व्रती अगले 36 घंटे का निर्जला व्रत आरंभ करते हैं, जो छठ पूजा के अंतिम अर्घ्य तक चलता है। खरना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि आत्मसंयम, श्रद्धा और शुद्धता का प्रतीक है। यह दिन भक्त और छठी मैया के बीच गहरी आस्था और आध्यात्मिक जुड़ाव को दर्शाता है।
और बढ़ेगी रौनक ः छठ महापर्व की दूसरे दिन और रौनक बढ़ेगी। सोमवार शाम और मंगलवार सुबह भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाएगा। इस पर्व में खुले जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सोमवार शाम को अस्ताचल सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। वहीं, मंगलवार को उदयगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दौरान महिलाएं 36 घंटे का निर्जला व्रत करेंगी। इसमें महिलाओं के साथ पुरुष भी निर्जला व्रत करते हैं। महिलाएं रविवार को खरना पूजन के बाद 36 घंटे के व्रत का संकल्प लेंगी। छठ पर्व के दूसरे दिन खरना होता है। इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं। शाम को, वे मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ या गन्ने के रस वाली खीर का प्रसाद बनाती हैं, जिसे सूर्य देव को अर्पित करने के बाद ग्रहण किया जाता हैं। खरना के साथ ही महिलाओं का 36 घंटे का व्रत भी शुरू हो जाता है।
छठ पर्व पर नहाय खहाय से शुरूआत करती महिलाएं संवाद