कैथल। बृहस्पति कुंड मंदिर के महंत श्री श्री 1008 बाबा विश्वनाथ पूरी के चोला छोड़ने के बाद साधु समाज सहित समस्त शहर में शोक की लहर है। माता गेट स्थित सूरजकुंड मंदिर महंत रमनपुरी ने बताया कि महंत विश्वनाथ पूरी ने अपने जीवन के 73 साल कैथल को दिए हैं। वे महज 25 साल की आयु में ही कैथल आए थे। उस दौरान वे कैथल में रमता पंच अष्ट कौशल महंत रहते हुए ही भ्रमण पर आए थे, जब उनके गुरु सुतेपुरी ने उन्हें यहां पर ही रहने का आदेश दिया। अपने गुरु के आदेश को मानते हुए वे कैथल ही रुक गए। रमनपुरी ने बताया कि गुरुजी का जन्म उड़ीसा के पुरी जिले के जगन्नाथ में हुआ था।
महज आठ से दस साल की आयु में ही उन्होंने साधु का चोला डाल लिया था। इसके बाद वे काशी और हरिद्वार में भी श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के डेरों में रहे। श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के रमता पंच अष्ट कौशल महंत बनने के बाद वे पूरे देश के भ्रमण पर थे। उस दौरान वे कैथल भी पहुंचे। महंत विश्वनाथ पुरी शिव के आराधक थे। वे नागा देव दिगंबर थे। वे ब्रह्मकुंड मंदिर के साथ शीतलपुरी डेरे के महंत भी रहे हैं। वर्ष 1998 में उन्होंने शीतलपुरी डेरे की गद्दी अपने शिष्य निरंजन पुरी को सौंप दी थी।
उत्कृष्ट वैध थे, आयुष में वैद्य की स्नातक की थी
महंत रमनपुरी ने बताया कि महंत विश्वनाथ पुरी एक उत्कृष्ट वैद्य थे। उन्होंने आयुष वैद्य में स्नातक की थी। एक वैद्य होने के नाते वे मंदिर प्रांगण में औषधियां उगाते थे। इन औषधियों के माध्यम से ही वे जरूरतमंदों का इलाज करते थे, लेकिन पिछले करीब 20 साल से औषधियां उगा तो रहे थे, लेकिन इससे दवा नहीं उगाई।
1998 के बाद से नहीं गए हरिद्वार
महंत रमनपुरी ने बताया कि महंत विश्वनाथ पुरी मंदिर में ही ईष्ट की भक्ति में लीन रहते थे। वे 1998 के बाद से कभी हरिद्वार नहीं गए थे। वे भगवान शिव की आराधना में ही लीन रहते थे। उनके चोला छोड़ने के बाद उनके शिष्यों, साधु समाज और शहर के लोग दुखी हैं।