फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Kaithal News: बासमती की लंबाई बढ़ी तो सुगंध हो गई कम

Sun, 07 Sep 2025 12:00 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
विज्ञापन
विज्ञापन
देव शर्मा
विज्ञापन


करनाल। बासमती शब्द हिंदी में संस्कृत से आया है। इसका अर्थ होता है सुगंध। सुगंध ही इसकी पहचान भी है लेकिन यह धीरे धीरे कम होती जा रही है। पुरानी किस्मों में जितनी सुगंध थी, नई में उसकी आधी भी नहीं रही। वजह है बासमती के मुरीद लोगों में सुगंध से ज्यादा लंबाई की चाहत होना है। बाजार की मांग देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने सुगंध से समझौता कर लंबाई पर फोकस किया। इसमें कामयाबी मिली पर अब कहानी बदल रही है। लोगों में फिर से सुगंध की चाहत बढ़ रही है। इसलिए, इसी पर ध्यान केंद्रित करते हुए नई किस्में तैयार करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

करनाल के केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान ( सीएसएसआरआई ) के धान प्रजनक वैज्ञानिक डॉ. लोकेश कुमार ने बताया कि बासमती की किस्में दुनिया के बाजार की मांग को देखकर तैयार की गईं। भारतीय बासमती की सबसे ज्यादा मांग खाड़ी देशों में है। निर्यातकों ने पाया कि सबसे ज्यादा वे किस्में पसंद की जा रही हैं, जिनकी लंबाई ज्यादा है। इसलिए, इसकी मांग बढ़ गई है। इसे देखते हुए शोधकर्ता वैज्ञानिकों ने ज्यादा लंबाई वाली बासमती विकसित कीं है। इनमें पूसा बासमती 1121, पूसा बासमती 1509, पूसा बासमती 1847, बासमती 370, कस्तूरी, देहरादूनी बासमती (टाइप 3) जैसी किस्में शामिल हैं।
विज्ञापन

इन सभी ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पकड़ मजबूत बना ली है। इसमें सीएसआरआई की ओर से वर्ष 2002 में रिलीज की गई सीएसआर-30 किस्म भी शामिल है, जो 160 देशों को निर्यात की जाती है। इससे पहले करनाल के तरावड़ी की बासमती सबसे ज्यादा पसंद की जाती थी। इसकी पहचान विशिष्ट सुगंध से है लेकिन मांग के साथ इसकी पैदावार कम होती जा रही है। तरावड़ी में भी ज्यादा लंबाई वाली किस्मों की पैदावार ज्यादा है। इनका ही निर्यात भी ज्यादा है।


किसानों को भी पसंद आई

हरियाणा राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन के प्रधान सुशील जैन ने बताया कि बासमती में खुशबू आज भी है लेकिन पुरानी बासमती जैसी बात नहीं है। बिरयानी और पुलाव में ज्यादा लंबा चावल पसंद किया जाता है। ज्यादा खुशबू वाली बासमती को शुरू से ही सऊदी अरब जैसे लेते थे, लेकिन इसका आकार छोटा है। इसलिए, इसकी पसंद का ग्राफ धीरे धीरे नीचे आ गया। किसानों को भी ज्यादा लंबाई वाली किस्में पसंद आई। सुगंध वाली किस्मों को उगाने में मेहनत ज्यादा है।
विज्ञापन


सुगंध बढ़ाने पर दे रहे ध्यान

डॉ. लोकेश कुमार ने बताया कि पिछले दस साल में यह महसूस किया गया है कि ज्यादा सुगंध वाली बासमती की मांग में इजाफा हुआ है। लोग पुरानी बासमती की सुगंध को याद कर नई किस्मों से तुलना करते हैं। इसे देखते हुए शोधकर्ता वैज्ञानिक ज्यादा सुगंध वाली किस्में विकसित करने पर काम कर रहे हैं। उम्मीद है इसमें जल्द ही सफलता मिलेगी।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें