कैथल। श्रीराम ट्रांसपोर्ट फाइनेंस कंपनी की ओर से 4.75 लाख रुपये का चेक बाउंस होने पर दायर किए गए मामले में अदालत ने कंपनी की शिकायत खारिज कर दी। कंपनी ने सतवीर सिंह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। रिकॉर्ड के अनुसार 9 सितंबर 2019 को सतवीर सिंह पर 1,28,445 रुपये बकाया थे। इसके सिर्फ दो दिन बाद 11 सितंबर को 4.75 लाख रुपये का चेक पेश किया गया। यानी बकाया राशि में 3,46,555 रुपये की बढ़ोतरी दिखाई गई लेकिन यह रकम किस आधार पर बढ़ी, इसका कोई साफ रिकॉर्ड नहीं मिला। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी संदीप कौर की अदालत ने सतवीर सिंह को बरी कर दिया।
कंपनी के अनुसार सतवीर सिंह ने वाहन नंबर HR09F-3942 के लिए ऋण लिया था। किस्तों का भुगतान नहीं होने के कारण उसके ऊपर रकम बकाया हो गई। कंपनी का कहना था कि इसी बकाया राशि को चुकाने के लिए सतवीर सिंह ने 11 सितंबर 2019 को 4.75 लाख रुपये का चेक दिया। 12 सितंबर को खाते में पैसे कम होने के कारण चेक बाउंस हो गया। इसके बाद कंपनी ने नोटिस भेजकर पैसे मांगे और अदालत में मामला दायर किया।
आरोपी ने कहा- असली बकाया बहुत कम था
सतवीर सिंह ने कंपनी के आरोपों से इन्कार किया। उसके पक्ष के वकील ने अदालत में कंपनी के खाते का रिकॉर्ड पेश किया। इसमें 9 सितंबर को बकाया राशि केवल 1,28,445 रुपये दिखाई गई थी। बचाव पक्ष ने सवाल उठाया कि जब बकाया इतनी कम राशि थी तो सिर्फ दो दिन बाद 4.75 लाख रुपये का चेक किस आधार पर लिया गया। अदालत ने कंपनी के खाते की जांच की तो 9 सितंबर से 11 सितंबर के बीच बकाया राशि में 3,46,555 रुपये की बढ़ोतरी मिली। लेकिन कंपनी यह साफ नहीं कर सकी कि इतनी रकम किस वजह से बढ़ी। खाते में ऐसी कोई साफ एंट्री नहीं मिली, जिससे ब्याज, जुर्माना या किसी दूसरी रकम के जुड़ने की बात साबित हो सके। अदालत के सामने यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया कि 11 सितंबर को 4.75 लाख रुपये की देनदारी आखिर कैसे बनी।
बाद की गणना भी नहीं आई काम
कंपनी ने 20 सितंबर 2019 की एक और हिसाब-किताब की रिपोर्ट अदालत में पेश की। इसमें 1,46,528 रुपये बकाया और 3,71,025 रुपये भविष्य की मूल रकम बताई गई थी। अदालत ने कहा कि यह हिसाब चेक देने के बाद का है। इसलिए इससे यह साबित नहीं होता कि चेक देने वाले दिन सतवीर सिंह पर 4.75 लाख रुपये बकाया थे।
कंपनी नहीं साबित कर सकी 4.75 लाख की देनदारी
अदालत ने कहा कि सतवीर सिंह ने कंपनी से लोन लिया था और कुछ रकम बकाया होना संभव है, लेकिन कंपनी को यह साबित करना था कि 4.75 लाख रुपये की पूरी रकम उस समय वास्तव में देनी थी। कंपनी के अपने रिकॉर्ड में रकम को लेकर अंतर मिला और 3.46 लाख रुपये बढ़ने का साफ कारण भी नहीं मिला। ऐसे में कंपनी अपना दावा साबित नहीं कर सकी। अदालत ने सतवीर सिंह को संदेह का लाभ देते हुए धारा 138 के मामले में बरी कर दिया और कंपनी की शिकायत खारिज कर दी।