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Kaithal News: धोती, कुरता, दामण आला... से जमाया रंग

Mon, 11 Nov 2024 03:23 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
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21 कैथल। साहित्य सभा की ओर से आयोजित काव्य-गोष्ठी में उपस्थित रचनाकार। संगठन
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कैथल। आरकेएसडी कॉलेज के अध्यापक कक्ष में रविवार को साहित्य सभा कैथल की नवंबर मास की काव्य-गोष्ठी हुई। इसकी अध्यक्षता साहित्य सभा के प्रधान और वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. अमृत लाल मदान ने की। इसका संचालन हरियाणवी-हिंदी रचनाकार रिसाल जागड़ा ने किया।
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गोष्ठी में अनिल गर्ग ने आजकल फैल रहे डेंगू रोग के कारण रोगियों की घट रहे प्लेटलेट्स पर कहा कि जो पहले घटतीं हैं वो घटनाएं, आज भी घट रहीं हैं। फ़र्क इतना सा है, प्लेटें पहले टेंट वालों की घटती थीं, अब मरीजों की घट रहीं हैं। हरियाणा की पुरातन संस्कृति को याद करते हुए सतपाल पराशर आनंद ने कहा, मन्नै वो हे हरियाणा चाहिए। सब रंग ढाल पुराणा चाहिए। धोती, कुरता, दामण आला, सीधा-सादा बाणा चाहिए। लौटकर जाना बड़ा मुश्किल होता है।
दिनेश बंसल दानिश ने शेयर प्रस्तुत कर कहा, कदम मुझसे बग़ावत कर रहे हैं, कभी सोचा नहीं था वापसी का। जिन माता-पिता की संतान बाग़ी हो जाती है उन माता-पिता के बारे में रामफल गौड़ कहते हैं, जीवैं सैं वे सुंदक-सुंदक कै, जिनके होज्यां बालक बागी। वर्तमान की युवा और बुजुर्ग पीढ़ी की दशा को दर्शाता। ईश्वर चंद गर्ग ने शेयर प्रस्तुत कर कहा, थिरक रहे कंगूरे सब, कांप रहे नींव-पत्थर। सांप्रदायिक दंगों को लेकर डाॅ. तेजिंद्र ने कहा, हिंदू भी अच्छा है। मुस्लिम भी अच्छा है। फिर यह आग लगाने वाला कौन है?
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इस प्रश्न को सुनकर , राजनीतिक गलियारा मौन है। मरने की चिंता छोड़ने का आह्वान करते हुए कवि भोला राम ने कहा, छोड़ चिंता मरने की,ऐसे नहीं कोई मर पाएगा। पहले आएगी मिस कॉल, फिर ओटीपी आएगा। विपरीत परिस्थितियों के विरुद्ध अपनी तैयारियों को लेकर रवींद्र रवि ने कहा, हर मौसम की अपनी हैं दुश्वारियां बहुत।हमने भी कर रखी हैं तैयारियां बहुत। मेहरु शर्मा प्यासा ने शेयर व्यक्त कर कहा, जिंदगी की कोई पेश चली ना, या सबकै आग्गै रोई लोगो। नारीपन का एहसास कराते हुए नीरु मेहता ने कहा, तुझ में और मुझ में, है भेद यही।मैं नारी हूं, तू नर है।
रिश्तों को सहेजने-संवारने में, मैंने गुज़ारी उमर है। रोहित शर्मा ने सर्दी के आगमन पर संस्कृत में कविता पढ़ी। घनघोर घटा की प्रतीक्षा में आकुल डाॅ. विकास आनंद ने कहा, मुद्दत से सूखा है आंगन, बरसी नहीं घटा घनघोर। रिसाल जांगड़ा ने कहा, शख़्स दुनिया का भला जो कर गया है।यश उसका ही बुलंदी पर गया है। मां से बिछुड़ी और शराबी पति के साथ यह रही पुत्री की व्यथा व्यक्त कर डाॅ.चतरभुज बंसल सौथा ने कहा, मां मन्नै छोड़ कै बग्गी, करगी कौणसे लोक चढाई री। किसपै रोऊ छाती फुक्कै सारा दिन तेरा जमाई री। डाॅ. अशोक ने कहा, क्या इरादे हैं मेरे ऐ ज़िंदगी।
वक्त ही बतलाएगा ऐ ज़िंदगी। कमलेश शर्मा ने कहा, आज का आदमी,ऐसी सुरंग से गुज़र रहा है, जिसका दिखता नहीं कोई ओर-छोर। बढ़ रहा है अनजाने किनारे की ओर। प्रो. अमृत लाल मदान ने उपस्थित रचनाकारों का आह्वान करते हुए कहा कि वे अपनी रचनाओं को धर्म, राजनीति, व्यक्तिगत कटाक्षों से मुक्त रखें। इस गोष्ठी में सुरेश कल्याण, श्याम सुंदर शर्मा गौड़, राज बेमिसाल, रजनीश शर्मा, डाॅ. प्रीतम लाल शर्मा और डाॅ. हरीश चंद्र झंडई ने भी अपनी रचनाओं से उपस्थित-जनों को आनंदित किया।
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