फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

युद्ध को याद करते ही आंखों में आती है अनोखी चमक

विज्ञापन
विज्ञापन
कैथल। कारगिल युद्ध में जिले का कोई सैनिक शहीद तो नहीं हुआ लेकिन कई ऐसे सैनिक हैं, जिन्होंने इस युद्ध का मंजर अपनी आंखों से देखा ही नहीं, बल्कि इस युद्ध में अपने देश के लिए लड़ाई भी लड़ी थी। इसमें हवलदार राजेश ढुल, कैप्टन बलजीत मोर और हवलदार संजीव राणा शामिल हैं।
विज्ञापन

पूर्व सैनिक राजेश ढुल बताते हैं कि कारगिल युद्ध को याद करते ही उनकी आंखों में अनोखी चमक आती है और उनका सीना चौड़ा हो जाता है। हवलदार के पद से रिटायर हुए सैनिक राजेश ढुल ने बताया कि वे वर्ष 1996 में सेना में भर्ती हुए थे। उस समय उनकी आयु महज 25 वर्ष की थी। उन्होंने वर्ष 1998 में बंगाल इंजीनियर ग्रुप सेंटर रुड़की में ट्रेनिंग की। इसके बाद वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध में शामिल हुए। वह 16 कोर ग्रुप में शामिल थे। वह सेना की इंजीनियरिंग विंग में कार्यरत थे। कारगिल युद्ध के समय उन्होंने देश के सैनिकों को बचाने के लिए बारूदी सुरंग बनाने में अपना सहयोग दिया था। उस समय इसी सुरंग के कारण कई सैनिकों की जान बची थी। लड़ाई के दौरान कई बार ऐसे मौके आए जब शहीद होते-होते वे बचे।
भूतपूर्व सैनिक कैप्टन बलजीत मोर ने बताया कि वह वर्ष 1983 में सेना में सिपाही के पद पर भर्ती हुए थे और 31 अक्तूबर 2014 को कैप्टन के पद से रिटायर हुए। उन्होंने बताया कि वह इन्फेंट्री सेना के जवान थे, जो हिंदुस्तान में सब पोस्टों पर पैदल चलकर जाते थे। 1999 मई में सेक्शन कमांडर से आदेश मिला था कि कारगिल में हमारी कई पोस्टों ट्रेनिंग देने के नाम पर पूरे साजो सामान लेकर पर कब्जा कर लिया है। इसके बाद कई जवानों को ट्रेनिंग देने के नाम पर पूरे साजो सामान लेकर कारगिल में भेजा गया। जून माह में पेट्रोलिंग ड्यूटी लगाई गई। पोस्टर नंबर 5060 पर उनको भेजा गया। जहां से वह दिन रात कारगिल क्षेत्र की कई पोस्टों पर पेट्रोलिंग करने लगे। पाकिस्तान की ओर से हिंदुस्तान में घुसने की कवायद की तो दोनों सेनाओं की ओर से गोलीबारी शुरू हुई। युद्ध में हमारी रेजिमेंट के कई जवान शहीद हुए, हमारी सेना ने भी पाक सेना के कई गुना सैनिकों को मौत के घाट उतारकर 26 जुलाई को अपनी पोस्टों को छुड़वा लिया था।
विज्ञापन

सूबेदार संजीव राणा ने बताया कि वह वर्ष 1997 में राजपुताना 11 राइफल सेना में भर्ती हुए। उस समय उनकी आयु महज 23 साल की थी। उनकी यूनिट के भी 40 से अधिक सैनिक कारगिल युद्ध में शामिल हुए। इनमें चार जवान शहीद हुए थे। सेना में शामिल होने के बाद ही देश के लिए लड़ना गर्व की बात रही। युद्ध के दौरान रात के समय दोनों सेना के जवानों में खूब फायरिंग हुई। जो सुबह तक चली। इस दौरान जो सैनिक शहीद हुए, उनके शवों को दूसरे सैनिक अपनी पीठ पर लेकर वापस लौटे थे। यह काफी दर्दनाक मंजर था। इसे वह जिंदगी भर नहीं भूला पाएंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें