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माता के जयकारों से गूंजेगा शहर

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नवरात्र आज से, मां की भक्ति में डूबेगा कैथल
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अमर उजाला ब्यूरो
कैथल। आज से शारदीय नवरात्र शुरू हो रहे हैं। कलश स्थापना के बाद कैथल मां की भक्ति में डूबेगा। इस बार नवरात्र पर अद्भुत संयोग भी बन रहा है। विद्वानों के मुताबिक करीब 12 साल के बाद ऐसे नवरात्र आए हैं, जिनमें एक भी तिथि ना तो घटी है ओर ना ही कोई तिथि बढ़ी है। पंडित प्रेम शंकर शास्त्री ने बताया कि करीब 12 वर्षों के बाद ऐसा संयोग बना है कि सभी नवरात्र पूरे हैं। वहीं दूसरी ओर नवरात्र को लेकर बाजारों में तैयारी पूरी हो चुकी है, मां की चुनरियां दुकानों में सज चुकी हैं। पूजन सामग्री की विशेष रूप से बिक्री की तैयारी की जा चुकी है। मंदिर परिसर को भी लाइट से सजाया जा रहा है। बड़ी देवी मंदिर, छोटी देवी मंदिर, खाटू श्याम मंदिर, श्री ग्यारह रूद्री मंदिर, हनुमान वाटिका में नवरात्रों को लेकर तैयारियां विशेष रूप से की जा रही हैं। मां भगवती के भक्तों की ओर से बेसब्री से इस अवसर का इंतजार किया जा रहा है। इस बार नवरात्र शनिवार से आरंभ होकर शनिवार को ही दुर्गा अष्टमी का शुभ संयोग है। मां का नवरात्र में आराधना करने पर कारोबार में वृद्धि होगा।
कलश स्थापित करने का शुभ समय
शिव शक्ति धाम के संचालक प्रेम शंकर शास्त्री ने बताया कि प्रथम नवरात्र के दिन सुबह 6 बजकर 15 से 8.40 मिनट तक शुभ मुहूर्त है। इसमें श्रद्धालु प्रात: स्नान करके घट स्थापना कर सकते हैं। विधि विधान के अनुसार स्नान के बाद फल-फूल, धूप-दीप, नारियल, चुन्नी, शृंगार सामग्री, सिंदूर के साथ आसन लगा कर बगैर भोजन ग्रहण किए श्रद्धालु जगद्जननी शैलपुत्री की उपासना करें। संकल्प करें की जिस प्रकार हमने घट स्थापना (कलश) किया है, इसी प्रकार हमारा परिवार अन्न, धन, वैभव से भरा रहे। गुलाब, गुड़हल फूल अर्पण करें। श्रीफल अर्पित करें। पंच मेवा का भोग लगाएं। इसके बाद प्रतिदिन 9 वर्ष से कम उम्र की कन्या का पूजन करें। साथ ही कन्या को दक्षिणा अवश्य दें। यदि आस-पास कोई कन्या मौजूद न हो तो श्रद्धालु दुर्गा मंदिर में भी फल को चढ़ा सकते हैं।
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इस समय पर शुभ नहीं कलश स्थापना
नवरात्र के दिन सुबह 10 बजकर 40 मिनट से लेकर 12.50 तक और दोपहर को 1 बजकर 30 मिनट से लेकर 3 बजे तक राहु काल है, जिसमें कलश स्थापित करना निषिद्ध है।
मां के नौ रूपों की पूजा
शरद नवरात्र 20 सिंतबर से शुरू हो जाएंगे। इसके बाद दुर्गा के नौ स्वरूपों की अलग-अलग दिन पूजा की जाएगी। प्रथम नवरात्र को शैलपुत्री, द्वितीय को, ब्रह्मचारिणी, तृतीय को चंद्रघंटा, चतुर्थ को कुष्मांडा, पांचवें नवरात्र को स्कंदमाता, छठे को कात्यायनी, सातवें को कालरात्रि आठवें को महागौरी और नौवें नवरात्र को सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है।
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