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पितरों व पितृगणों को प्रसन्न और तर्पण करने के लिए श्राद्धों का विशेष महत्व

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पितरों व पितृगणों को प्रसन्न और तर्पण करने के लिए श्राद्धों का विशेष महत्व
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फोटो नंबर-35
अमर उजाला ब्यूरो
गुहला चीका। सोमवार को पहला श्राद्ध हैं। भारतीय संस्कृति में श्राद्ध का विशेष महत्व है। शिव शक्ति ज्योतिष केंद्र चीका के संचालक पंडित सुल्तान शास्त्री ने श्राद्ध के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पुराणों में कहा गया है कि जब सूर्य कन्या राशि में आता है तब पितृपक्ष शुरू होता है।
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उन्होंने बताया कि पितरों को प्रसन्न और तर्पण करने के लिए शास्त्रों में प्रत्येक वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को श्राद्ध पक्ष के रूप में मनाए जाने का विधान है। इन श्राद्धों के समय पितृगणों के निमित्त श्राद्ध तर्पण आदि कर्म किये जाते हैं। इस दृष्टि से श्राद्ध पक्ष विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इस समय पितृगण पितृलोक छोड़कर भूलोक पर आते हैं और यहां वे अपने वशंजों से पिण्डदान, श्राद्ध, तर्पण इत्यादी कि विशेष आकांक्षा रखते हैं। ऐसे में श्राद्ध पक्ष में पितृदोष की शांति के लिए एवं पितरों की प्रसन्नता के लिए उचित उपाय करने चाहिए। शास्त्री ने बताया कि जिस तिथि को आपके पूर्वज की मृत्यु हुई हो, श्राद्ध पक्ष में उसी तिथि को संबंधित पूर्वज के निमित्त किसी ब्राह्मण को विधि विधान से पूर्ण श्रद्धा सहित भोजन करवाना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में गया, पिहोवा, हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, फल्गु इत्यादि तीर्थो पर स्नान, पिंडदान व विशेष पूजा करवाने का विधान है। पितृपक्ष में पीपल की परिक्रमा 108 बार करें और देसी घी का दीपक जलाये। किसी मंदिर परिसर में पीपल या बड़ का वृक्ष लगाए। पितृपक्ष के दौरान गौ सेवा करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि साल 2018 में श्राद्ध 24 सितंबर सोमवार पूर्णिमा से आरंभ होकर 8 अक्टूबर सोमवार अमावस को समाप्त होंगे। इस बार सोमवती अमावस्या है। सोमवार से युक्त अमावस्या हो तो अनन्त फल देने वाली होती है और पितृगणों को दिया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है। सोमवती अमावस्या को फल्गु तीर्थ पर स्नान, पिंडदान, तर्पण, पूजा विशेष अनंत फलों को देने वाली होगी। पितरों के निमित्त जो व तिलों से की गई पूजा विशेष फलदायी होती है।
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