फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शास्त्रीय नियमों के साथ करें पितृ पक्ष में पूजा

विज्ञापन
विज्ञापन
शास्त्रीय नियमों के साथ करें पितृ पक्ष में पूजा
विज्ञापन

आज से शुरू होगा पितृपक्ष
अमर उजाला ब्यूरो
कलायत। बुधवार से शुरू होने वाले पितृपक्ष में श्राद्ध के शास्त्रीय नियमों के साथ पूजा-अर्चना करें। वृंदावन से पधारे इंद्राचार्य जी महाराज ने श्राद्धों के बारे में बताया कि श्राद्ध यदि शास्त्रीय नियमानुसार किया जाए तो बेहतर प्रभाव देता है। उन्होंने बताया कि आश्विन माह के कृष्ण पक्ष को हम श्राद्ध पक्ष, पितृपक्ष, महालप पक्ष भी कहते है। दिवंगत व्यक्तियों की मृत्यु तिथि के अनुसार ही श्राद्ध किए जाते है। श्राद्ध 2 प्रकार के होते है जिसमें पार्वण पद्धति तथा एकोदिष्ट पद्धति के होते है। उन्होंने बताया कि पार्वण पद्धति अपराह्ण व्यापिनी तिथि (10वें मुहुर्त से 12वें मुहुर्त) में किया जाता है। जिसमें पिता, दादा, परदादा, माता, दादी, परदादी, नानी, परनानी, वृद्ध परनानी का श्राद्ध किया जाता है। इंद्राचार्य ने बताया कि यदि श्राद्ध तिथि का मान 60 घड़ी या इससे अधिक हो तो श्राद्ध उसी तिथि में किया जाएगा जबकि यदि तिथि मान 60 घड़ी से कम है तो श्राद्ध पहले दिन किया जाएगा। एकादिष्ट श्राद्ध बारे उन्होंने कहा कि मध्याहण व्यापिनी (7वें मुहुर्त से 9वें मुहुर्त) तक तिथि में किया जाता है। जिसमें उपाध्याय, गुरू, ससुर, चाचा, मामा, भाई, बहनोई, भतीजा, शिष्य जमाता, फुफा, मासड़, पुत्र, मित्र, विमाता के पिता, तथा इन सभी की पत्नियों का श्राद्ध एकोदिष्ट नियम के अनुसार किया जाता है। शास्त्रों में पूणमा का श्राद्ध करना निषेध लिखा गया है लेकिन भाद्रपद पूणमा को प्रोष्ठपदी पूणमा की संज्ञा दी गई है जिसके कारण ही भाद्र माह की पूणमा को आश्विन अमावस की तरह माना गया है।
सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध नियम- सौभाग्यवती स्त्री(जिसका पति ङ्क्षजदा हो मगर स्वयं मर गई हो) का श्राद्ध नवमी तिथि को ही करना चाहिए। बेशक मृत्यु की तिथि कोई भी हो। शास्त्र का नियम यही कहता है।
विज्ञापन

अपमृत्यु वालों का श्राद्ध नियम-अपमृत्यु उसे कहते है जिसमें परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु दुर्घटना, शस्त्र, विष या सर्पदंश के कारण हो जाती है। इस प्रकार पिता, पितामह परपितामह आदि कोई 2 पूर्वज अपमृत्यु को प्राप्त हुए हो तो उनका श्राद्ध मध्याह्ण व्यापिनी तिथ में मनाया जाता है जबकि 3 पूर्वज इस प्रकार से मृत्यु को प्राप्त हो जाते है तो फिर ऐसे में उनका श्राद्ध जो तिथि हो उसमें न करके पितृपक्ष की चतुर्दशी में ही किया जाएगा भले ही उनकी मृत्यु तिथि कोई भी हो।
चतुर्दशी श्राद्ध का नियम- चतुर्दशी श्राद्ध के नियम बारे जानकारी देते इंद्राचार्य ने बताया कि इस तिथि में प्राकृतिक मृत्यु से मरने वालों का महालप श्राद्ध चतुर्दशी में न करके त्रयोदशी में या अमावस को करना चाहिए। अमावस को सर्व पितृपक्ष माना गया है।ञ इस दिन प्राकृतिक, अप्राकृतिक मृत्यु के साथ ज्ञात व अज्ञात तिथियों में मरने वाले का श्राद्ध मनाया जाता है ऐसा शास्त्र का नियम है।
विज्ञापन

बाजार पर प्रभाव- 4 सितंबर को शुक्र अशर्ेषा नक्षत्र में दाखिल हो गया है। इस समय राहू भी कर्क राशि एवं अश्लेषा नक्षत्र में विराजमान हैं। परिणाम स्वरूप मंदी का योग होने पर भी हमें रुई, अरहर, चावल व ग्वार आदी में तेजी के आसार नजर आ रहे हैं। इस समय बुध, राहु व शुक्र का योग प्राकृतिक आपदा का भी संकेत दे रहा है। बाजार में चांदी, रेशम, तेल अलसी, बिनौला, मुंगफली, गुड़, चंदन, कपूर में मंदी व्याप्त होगी।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें