सोनू थुआ कैथल। जिले की अदालतों में लंबित मुकदमों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। अदालती आंकड़ों के अनुसार, जिले में 38,870 मुकदमे लंबित हैं। इनके अलावा नए मामलों की संख्या बढ़ने के साथ पुराने मामलों के निस्तारण की रफ्तार अपेक्षाकृत
धीमी बनी हुई है। इसका असर न्याय प्रक्रिया पर पड़ रहा है और कई लोगों को वर्षों तक फैसले का इंतजार करना पड़ रहा है।
नेशनल ज्यूडिशियरी डाटा ग्रिड (एनजेडीजी) के आंकड़ों के अनुसार जिले की अदालतों में लंबित 38,870 मुकदमों में 23,205 आपराधिक और 15,665 सिविल मामले शामिल हैं। चिंता की बात यह है कि एक वर्ष से अधिक समय से लंबित मामलों की संख्या 24,279 तक पहुंच चुकी है। इनमें 14 हजार 571 आपराधिक मामले शामिल हैं, जबकि बड़ी संख्या में सिविल मामले भी वर्षों से लंबित हैं। यह स्थिति न्याय
व्यवस्था पर बढ़ते दबाव की ओर संकेत करती है।
वेबसाइट के आंकड़ों के अनुसार मुकदमों के निस्तारण में देरी के कई कारण सामने आते हैं। कई बार बचाव या अभियोजन पक्ष के वकील अगली तारीख ले लेते हैं।
इसके अलावा गवाहों के सुनवाई के दौरान उपस्थित न होने से भी मामले आगे खिसक जाते हैं। पुलिस की ओर से साक्ष्य प्रस्तुत करने में देरी भी निस्तारण की गति को प्रभावित करती है।
महिलाएं और बुजुर्ग भी काट रहे अदालतों के चक्कर : कुल लंबित मामलों में करीब छह प्रतिशत मामले महिलाओं द्वारा दर्ज कराए गए हैं। इनमें 1,422 सिविल और 995 आपराधिक मामलों सहित कुल 2,407 मामले शामिल हैं। वहीं वरिष्ठ नागरिकों की ओर से दर्ज मामलों की संख्या 3,229 है, जो कुल लंबित मामलों का
लगभग आठ प्रतिशत है। इनमें 2,639 सिविल और 590 आपराधिक मामले शामिल हैं।
ऐसे मामलों में देरी का सीधा असर महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ता है, जिन्हें न्याय के लिए बार-बार अदालतों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। ये आंकड़े नेशनल ज्यूडिशियरी डाटा ग्रिड (एनजेडीजी) वेबसाइट पर उपलब्ध रिकॉर्ड पर आधारित हैं। संवाद
कभी वकील की तारीख, कभी गवाह गैरहाजिर
आंकड़ों के अनुसार, एक वर्ष से कम अवधि वाले 14,591 मामले लंबित हैं, जो कुल लंबित मामलों का लगभग 38 प्रतिशत हैं। वहीं, एक से तीन वर्ष पुराने 11,109 मामले (करीब 29 प्रतिशत), तीन से पांच वर्ष पुराने 7195 मामले (लगभग 19 प्रतिशत) और पांच से दस वर्ष पुराने 5887 मामले (करीब 15 प्रतिशत) हैं। दस वर्ष से अधिक समय से लंबित 88 मामले अब भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।