लछमन सिंह का दावा- सूर्ययंत्र से धुएं के गुबार की समस्या का हो सकता है समाधान
- सातवीं पास लछमन सिंह बना चुके हैं कई यंत्र, न अधिकारी, न वैज्ञानिक कर रहे हैं सुनवाई
फोटो संख्या-1 व 2
अमर उजाला ब्यूरो
कैथल। आज जब पूरा देश प्रदूषण व वातावरण में धुएं की समस्या से जूझ रहा है। विशेष रूप से उत्तरी भारत में सांस लेना दूभर हो गया है। लगभग सभी शहर गैस चैंबर के रूप में तब्दील हो गए हैं। ऐसे में कैथल में सातवीं पास कृषि वैज्ञानिक लछमन सिंह का दावा है कि उनके द्वारा तैयार किए गए सूर्ययंत्र से धुएं को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन उनका दावा है कि पहले की ही तरह इस बार भी कृषि विज्ञान केंद्र कैथल में उसकी सुनवाई नहीं की गई और उन्हें खाली हाथ लौटा दिया गया।
ऐसे काम करेगा लछमन सिंह का सूर्ययंत्र : लछमन सिंह जो कृषि संबंधी कई खोज कर चुके हैं जिसमें उनकी कई खोज पेटेंट कार्यालय में लंबित हैं। उनका दावा है कि उन्होंने ऐसा सूर्ययंत्र बनाया है, जिसे किसी भी ठोस इंधन को जलाने वाली प्रक्रिया की जगह लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए राइस मिलों में चलने वाल ब्वॉयलर, घर-घर में जल रहे चूल्हों, फैक्टरियों की चिमनियों सहित कई जगह इसे लगाया जा सकता है। जहां वह पर्यावरण से हवा, जमीन के तापमान व ईंधन से निकलने वाली गैसों की मदद व प्रकाशित तापमान की मदद से ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ा देगा और ईंधन बिना धुएं के जलेगा। जो भी धुआं या अवशेष निकलेगा, वह पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाएगा। इसके अलावा कार्बन, अमोनिया के संयोग से ऑक्सीजन भी पैदा होगी। इस ईंधन से भोजन भी बनाया जा सकेगा। इसके अलावा भी इस यंत्र के कई प्रयोग हो सकते हैं। लछमन सिंह ने बताया कि उसके घर पर पिछले सात माह से यह सूर्ययंत्र चल रहा है। घर चलाने के लिए रुपये-पैसे से मोहताज लछमन सिंह इस प्रयोग को लेकर कृषि विज्ञान केंद्र कैथल में गए थे। वहां उन्होंने अपने प्रयोग को दिखाने के लिए 5100 रुपये की राशि भी खर्च की। लेकिन उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई।
पराली सहित किसी भी तरह के अवशेष का हो सकता है ईंधन के तौर पर प्रयोग : लछमन सिंह ने दावा किया कि सूर्ययंत्र नामक उसके इस प्रयोग में ही पराली सहित अन्य अवशेषों से ईंधन, खाद व दवा बनाई जा सकती है। वे स्वयं पराली से ईंधन बना रहे हैं। यदि सरकार चाहे तो वे इस पूरे फार्मूले को निशुल्क सरकार को देने को तैयार हैं। बशर्ते इसका प्रयोग देशहित में हो।
लछमन सिंह का एक प्रोजेक्ट है। यह बात मुझे भी बताई गई है। वे इसे कृषि विज्ञान केंद्र में प्रदर्शित करना चाहते हैं। जब इसका प्रदर्शन हो जाएगा, इसके बाद ही कुछ बताया जा सकेगा कि यह कितना कारगर होगा।
डॉ. देवेंद्र चहल, मुख्य वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र