दमा के रोगियों के लिए वरदान है शरद पूर्णिमा की रात : शांडिल्य
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अमर उजाला ब्यूरो
कलायत। शरद पूर्णिमा की रात्रि दमा के बीमारी वालों के लिए वरदान की रात है। पूरे साल में केवल इसी दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। हिंदू धर्म में इस दिन कोजागर व्रत माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। मान्यता है इस रात्रि को चंद्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चांदनी में रखने का विधान है। चंद्रमा की पूर्ण चांदनी व उसमें रखी गई खीर खाने से दमा के रोगियों को पूर्ण आराम मिलता है।
शरद पूर्णिमा को लेकर पंडित विशाल शर्मा ने बताया कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था। साथ ही माना जाता है कि इस दिन मां लक्ष्मी रात के समय भ्रमण में निकलती है, यह जानने के लिए कि कौन जाग रहा है और कौन सो रहा है। उसी के अनुसार मां लक्ष्मी उनके घर पर ठहरती है। इसलिए इस दिन सभी लोग जगते हैं। जिससे कि मां की कृपा उनपर बरसे और उनके घर से कभी भी लक्ष्मी न जाएं। शरद पूर्णिमा की रात में खीर का सेवन करना इस बात का प्रतीक है कि शीत ऋतु में हमें गर्म पदार्थों का सेवन करना चाहिए क्योंकि इसी से हमें जीवनदायिनी ऊर्जा प्राप्त होगी।
शरद पूर्णिमा की रात को क्या करें, क्या न करें : पंडित शर्मा ने बताया कि दशहरे से शरद पूर्णिमा तक चंद्रमा की चांदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं। इन दिनों चंद्रमा की चांदनी का लाभ उठाने से हम वर्ष भर स्वस्थ और प्रसन्न रह सकते हैं। नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए दशहरे से शरद पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात्रि में 15 से 20 मिनट तक चंद्रमा के ऊपर त्राटक करना चाहिए। शरीर की जो भी इंद्रियां शिथिल हो गई हों उनको पुष्ट करने के लिए चंद्रमा की चांदनी में खीर रख अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना विशेष फलदायी होता है। चंद्रमा की चांदनी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है। शरद पूर्णिमा की चांदनी का अपना विशेष महत्व है। लेकिन बारहों महीने चंद्रमा की चांदनी गर्भ को और औषधियों को पुष्ट करती है। हमारे शरीर में जो जलीय अंश, सप्त धातुएं व सप्त रंग हैं उन पर भी शरद पूर्णिमा की चांदनी का विशेष प्रभाव पड़ता है। चंद्रमा की रोशनी में विष्णु जी और लक्ष्मी जी के सामने बैठकर अधिक से अधिक समय तक जप करने से पूरे साल भर लक्ष्मी जी की कृपा बनी रहती है।