भट्ठा संचालकों ने फिर मांगी जिग-जैग तकनीक में दो साल की छूट
अग्रवाल धर्मशाला में आयोजित सम्मेलन में जुटे आठ जिलों के भट्ठा मालिक
50 लाख रुपये की लागत से भट्ठों पर विकसित होगी नई तकनीक, प्रदूषण के स्तर में कमी के चलते लिया गया था निर्णय
अमर उजाला ब्यूरो
कैथल। एनसीआर से अलग आठ जिलों के भट्ठा मालिकों ने सरकार से एक बार फिर से जिग-जैग तकनीक में दो साल की राहत की मांग की है। पिछले साल सरकार ने भट्ठा संचालकों को एक साल की छूट दी थी। लेकिन अभी भी सभी भट्ठा संचालकों ने नई तकनीक से भट्ठे नहीं बनाए हैं। करीब 500 भट्ठा संचालकों ने सरकार से यह मांग की है। यदि सरकार इस मांग को पूरा नहीं करती है तो इन भट्ठों में इस बार ईंटें नहीं बन पाएंगी।
रविवार को कैथल, हिसार, सिरसा, फतेहाबाद, पंचकूला, अंबाला, कुरुक्षेत्र व यमुनानगर के लगभग 500 से अधिक भट्ठा संचालक कैथल के जींद रोड स्थित अग्रवाल धर्मशाला में पहुंचे। जहां इन एनसीआर से बाहर के आठ जिलों के प्रतिनिधियों ने आवाज उठाई। बैठक की अध्यक्षता अंबाला एसोसिएशन के प्रधान एचएल बिंद्रा ने की। वहीं कैथल जिला प्रधान रामकुमार बंसल, बलबीर सिंह गठवाल हिसार, अमित शर्मा यमूनानगर,मदन लाल सिरसा, सतबीर फतेहाबाद, प्रदीप, जितेंद्र गोयल, प्रेमचंद, कृष्ण खुराना, राजेंद्र बंसल, सुशील जैन, रामफल चहल सहित अन्य ने विचार रखे।
भट्ठा मालिकों ने कहा कि नई तकनीक विकसित करने में भट्ठा मालिक को 50 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। भट्ठा का पुनर्निर्माण करने में 3 से 4 माह लगते हैं। कई भट्ठा संचालक इतना खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं। लेबर महंगी होती जा रही है। इसीलिए सरकार से मांग है कि अभी भी जो भट्ठा संचालक नई तकनीक अपने भट्ठों पर विकसित नहीं कर सके हैं, उन्हें कम से कम दो साल का समय दिया जाए।
क्या है जिग-जैग तकनीक : जिला प्रधान रामकुमार बंसल ने बताया कि सरकार ने प्रदूषण रोकने के लिए पहले एनसीआर फिर बाद में पूरे प्रदेश में भट्ठा संचालकों को जिग जैग तकनीक से भट्ठा विकसित करने के लिए निर्देश दिए हैं। पिछले साल सरकार ने गैर एनसीआर के आठ जिलों में चल रहे भट्ठा को एक साल की छूट दी थी, लेकिन अभी भी सभी भट्ठा संचालक इसे विकसित नहीं कर पाए हैं। इसीलिए अब उनकी मांग है कि नई तकनीक विकसित करने के लिए कम से कम दो साल का समय दिया जाए। इसके लिए राज्यमंत्री कर्णदेव कंबोज से भी मिल चुके हैं। भट्ठा मालिकों ने ऐलान किया है कि जब तक उन्हें समय नहीं दिया जाता, तब तक वे नए सीजन में ईंट बनाने में सक्षम नहीं हो पाएंगे।
भट्ठा मालिक ही कर रहे हैं एक दूसरे का विरोध : बैठक में कई वक्ता इस बात पर मुखर दिखे कि जिन भट्ठा संचालकों ने भारी भरकम खर्च करके नई तकनीक पर काम कर लिया है, अब वे ऐसे भट्ठा संचालकों को परेशान करने लगे हैं, जो यह तकनीक विकसित नहीं कर पाए हैं। जिससे वे जाने अनजाने में अपने ही धंधे का विरोध कर रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए। भट्ठा संचालकों को एकजुट होकर अपनी समस्याओं को लेकर संघर्ष करना चाहिए।
भट्ठा नहीं चले तो और महंगी हो सकती हैं ईंटें : इस समय प्रति एक हजार ईंटों की कीमत 4800 रुपये तक है। यदि सीजन में भट्ठा नहीं चलते हैं तो ईंटें और महंगी हो सकती हैं। इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा।