रोज-रोज थोपे जा रहे नए नियमों व प्रावधानों से तंग ट्रांसपोर्ट नगर के दुकानदारों ने की हुडा से तौबा
सौ से अधिक ने किया सरेंडर
5 साल, 411 में से 389 दुकानदारों ने जमा करवाए 40 करोड़ से अधिक
एसोसिएशन के प्रधान ने कहा- अब इससे ज्यादा दुकानदारों को नहीं समझा सकता
ट्रांसपोर्ट नगर के सपने में एक पीढ़ी की उम्र निकली, अब और नहीं होता संघर्ष
फोटो संख्या-15 से 17
नसीब सैनी
कैथल। ट्रांसपोर्ट नगर का सपना जो वर्ष 2002 में शहर में मिस्त्री मार्केट के दुकानदारों सहित शहर के लोगों को दिखाया गया था, वह सपना हुडा विभाग की रोज-रोज बदल रही नीतियों, तुगलकी फरमानों के चलते अब टूटता नजर आ रहा है। विभाग के अधिकारियों द्वारा अपनाई जा रही भेदभावपूर्ण, तानाशाही नीतियों का खामियाजा है कि 5 साल बाद 100 से अधिक दुकानदारों ने अपनी दुकानें विभाग को सरेंडर कर दी है।
वर्ष 2002 में हुआ था फैसला : पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने जींद रोड पर ट्रांसपोर्ट नगर का शिलान्यास किया था। इसके बाद कांग्रेस सरकार में मंत्री सुरजेवाला ने इस प्रोजेक्ट में विशेष रुचि ली और इसमें दुकानदारों को दुकानें अलॉट करवाने की प्रक्रिया शुरू करवाई। उनकी रुचि लेने के बावजूद हुडा की नीतियों का ही परिणाम था कि वर्ष 2014 में जाकर अलॉटमेंट हुई थी। अलॉटमेंट के बाद शुरू हो गया ट्रांसपोर्ट नगर एसोसिएशन के दुकानदारों का चंडीगढ़ व हुडा कार्यालय में चक्कर लगाने का सिलसिला। जो आज तक जारी है। विभाग से तंग आए एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने अपनी परेशानियां कुछ इस तरह से बयां कीं।
ट्रांसपोर्ट नगर एसोसिएशन के प्रधान रमेश नागपाल व उप-प्रधान श्याम लाल गर्ग की दी गई जानकारी के अनुसार-
1. हुडा के एक अधिकारी ने एक दुकानदार, जो खुद काम करता है, उसकी न जाने कैसी अर्जी उन्हें मिली। उस अर्जी पर उसकी दुकान को बड़ी से छोटी में परिवर्तित कर दिया। इस नियम का उदाहरण देकर जब उन 17 दुकानदारों के बच्चे विभाग में पहुंचे, जिनकी मौत हो चुकी थी, उनकी अर्जी स्वीकृति ही नहीं हुई। आज तक केवल एक दुकान को छोड़कर किसी जरूरतमंद दुकानदार व उसके परिजनों के आवेदन पर बड़ी दुकान को छोटी में तब्दील नहीं किया गया। महज एक को क्यों किया गया? यह आज तक यक्ष प्रश्न है। बड़ी दुकान 16.34 लाख में 15 गुणा 45 के साइज में व छोटी दुकान 5.88 लाख में 9 गुणा 27 के साइज में अलॉट की गई थी।
2. जितनी साइज की दुकान अलॉट की गई थी, उसमें से दुकानदारों को कहा गया कि 9 फुट की जगह बड़े वाहनों के लिए छोड़नी होगी। दुकानदारों ने विरोध किया तो उन्हें 3 फुट वापस करके 6 फुट फिर भी खाली छोड़ी गई।
3. खाली जगह के विवाद में 3 फुट की रियायत देने का फैसला 21 अगस्त 2018 को दिया गया, तब तक दुकान बनाने की मियाद समाप्त हो गई थी। इसके बाद 15 मार्च 2018 को नया नक्शा बनाया गया। दुकानदारों ने संघर्ष किया तो केवल बड़ी दुकानों के लिए 17 माह की रियायत दे दी गई। लेकिन छोटी दुकान को रियायत नहीं मिली तो बिना बड़े वाहनों के मरम्मत के छोटी दुकान के मालिकों ने कहा कि वे अभी से दुकानें वहां बनाकर क्या करेंगे? जब ग्राहक ही नहीं होंगे।
इसके बाद एसोसिएशन ने छोटे दुकानदारों के लिए समय मांगा। अब पता चला है कि विभाग से छोटे दुकानदारों को एक साल का समय मिल गया है, लेकिन यह फाइल अभी तक जिलास्तर पर नहीं पहुंची है। जिस कारण मामला अधर में लटका है।
4. जब दुकानदारों को दुकान बनाने की छूट दे दी गई तो फिर एक्सटेंशन फीस लगा दी गई। छोटी के लिए 613 और बड़ी के लिए 1701 रुपये की फीस लगा दी गई। इस पर दुकानदारों ने कहा कि जब फीस ही लगा दी है तो वे जब मर्जी तक दुकान बनाएं। फिर समय सीमा क्यों?
5. इसी बीच 4 माह पहले विभाग ने दुकानदारों को नोटिस जारी कर दिया कि दुकान न बनाने पर क्यों न आपकी अलॉटमेंट रद्द कर दी जाए। जबकि दुकानदारों के अनुसार एक बार अलॉटमेंट के बाद दुकान सरेंडर किए बिना रद्द हो ही नहीं सकती।
6. इतनी दुश्वारियों के बावजूद 4 दुकानदारों ने अब दुकान बनानी शुरू की तो विभाग ने 5 हजार रुपये पानी के कनेक्शन, 5 सीवरेज के लिए अनुमति फीस, दोनों के लिए 25-25 हजार रुपये की सिक्योरिटी फीस जमा करवाने का नोटिस थमा दिया। इस तरह से बड़ी दुकान बनाने के लिए 60 हजार रुपये और जमा करवाने होंगे।
7. सबसे बड़ी समस्या जो दुकानें अलॉट की गई हैं, उनके लिए अलॉटमेंट लेटर नहीं दिया गया, अस्थाई पत्र दिया गया है। जिस पर बैंक लोन भी नहीं कर रहे। दुकानदारों का कहना है कि 16-16 लाख रुपये जमा करवाने के बाद दुकान बनाने के लिए पैसे नहीं हैं। जब तक रजिस्ट्री नहीं हो जाती, तब तक लोन नहीं होगा। रजिस्ट्री के लिए अस्थाई नहीं, स्थाई अनुमति पत्र चाहिए।
अब संघर्ष से उम्मीद टूटी, दुकानदारों की मर्जी सरेंडर करो या रखें : ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के प्रधान रमेश नागपाल ने बताया कि रेलवे ओवर ब्रिज बनने से उन पर मुसीबत यह थी कि यहां ग्राहक कम हो गए थे। दूसरा शहर में जाम से मुक्ति की बात भी कही जाती थी कि यह नगर विकसित होने पर दोनों समस्याओं का समाधान होगा। वे खुद चंडीगढ़, पंचकूला के चक्कर लगाते हुए थक चुके हैं। अब जो दुकानदार उनके पास आता है, वे उन्हें कह देते हैं कि अपनी मर्जी अनुसार सरेंडर करो या रखो।
100 से अधिक दुकानदारों ने किया सरेंडर, 10 प्रतिशत राशि काट कर होगी वापिस : हुडा विभाग से मिली जानकारी के अनुसार ट्रांसपोर्ट नगर से करीब 100 से अधिक लोगों ने सरेंडर कर दिया है। जिन्हें 10 प्रतिशत राशि काटकर सारी राशि वापस कर दी जाएगी। वहीं दुकानदारों से मिली जानकारी के अनुसार ट्रांसपोर्ट नगर की कुल 750 दुकानों में से 411 दुकानें अलॉट हुई थी। इसमें से 389 ने पैसे जमा करवाए। 244 दुकानें छोटीं व 154 दुकानें बड़ी हैं। जिसके लिए 40 करोड़ रुपये से अधिक की राशि दुकानदारों की जमा हुई थी।
पीढ़ी ट्रांसपोर्ट नगर के सपने में गुजर गई साहब। हमें कंट्रोल रेट पर दुकानें देने की बात कही गई थी। लेकिन मिली 21 हजार रुपये प्रति वर्ग गज से अधिक की कीमत पर। कई दुकानदार ट्रांसपोर्ट नगर की उम्मीद में दुनिया छोड़कर चले गए। 20 साल में हमारी पीढ़ी ही बीत गई। अब आस टूट गई है। इसी कारण लोग सरेंडर कर रहे हैं।
श्याम लाल गर्ग, उप-प्रधान
हुडा विभाग के एसडीओ आरपी सिंगला ने कहा कि उनका काम निर्माण संबंधी है। कार्यालय संबंधी उन्हें जानकारी नहीं है।