जींद। शिव कॉलोनी स्थित अक्षर भवन में मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस की पूर्व संध्या पर जनवादी लेखक संघ की कविता गोष्ठी का आयोजन हुआ। इसकी अध्यक्षता राममेहर कमेरा ने की। कवियों ने मौजूदा के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हालात पर व्यंग्य करती और मजदूरों के जीवन संघर्षों को रेखांकित करती कविताएं सुनाईं।
राममेहर कमेरा ने अपने दोहों में कहा कि सत्ता तूने बना दिए कैसे-कैसे योग, बड़े-बड़े घर में मिले छोटे-छोटे लोग। चार बरस की नौकरी, चिंतित पिता-किसान। अग्निवीर जीवन तेरा, लगता बीयाबान। राजेश भेंट ने कैसा आया रै जमाना, ना है कोई अनजाना, ये तो सबने है मनाए हुई कैश प्रोबलम। हर किसी को, हर किसी को एकै सै प्रोबलम। मंगतराम शास्त्री ने कहा कि श्रम की चोरी का दर्द सहा है मेरी पुश्तों ने पर नीले गृह को बसने लायक मैंने ही बनाया है। मैं श्रमजीवी हूं, जग को संस्कृति व सभ्यता का पाठ मैंने ही पढ़ाया है। विक्रम राही ने त्यार रहया कर त्यारां गैल्यां।
अपणे मित्तर प्यारां गैल्यां। तज लाट्ठी बुड़के बंदूक लड़ना सीख विचारां गैल्यां। जो घाट-घाट का पाणी छाणैं तूं म्ह राख बणजार्यां गैल्यां। कपिल भारद्वाज ने सुनाया तानाशाह पक्षियों को दाना नहीं डाल सकता, हारमोनियम नहीं बजा सकता, रोटी नहीं बना सकता, कविता नहीं लिख सकता, प्रेम नहीं कर सकता। प्रवेश कुमार ने भूखे मरे बच्चे सर्द बुखारों से, जुल्म सहे कब तक ये गद्दारों से, फूटेगा इनका ज्वाला इनके औजारों से, तभी चलेगा सही आंदोलन लाखों हजारों से सुनाया।