जींद। जिला स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली के चलते दिव्यांग बेबस और लाचार हैं। दिव्यांग मेडिकल प्रमाण पत्र बनवाने के लिए दर बदर भटक रहे हैं। फिर भी दिव्यांगों के मेडिकल प्रमाणपत्र नहीं बन पा रहे हैं। दो-दो माह चक्कर काटने के बाद भी दिव्यांगों को वापस भेज दिया जाता है। जो चलने-फिरने, उठने-बैठने में भी असमर्थ है उनके भी मेडिकल प्रमाण पत्र नहीं बनाए जा रहे।
सेक्टर-8 स्थित पॉलीक्लीनिक में पेयजल व्यवस्था, शौचालय, बिजली व्यवस्था ठप पड़ी है। यदि बिजली चली जाए तो चिकित्सकों को अंधेरे में ही दिव्यांगों की मेडिकल जांच करनी पड़ती है। वहीं सेक्टरों में वाहनों का आवागमन नहीं होने से दिव्यांगों को स्पेशल ऑटो या ई-रिक्शा लेकर आना पड़ता है।
जिला स्वास्थ्य विभाग ने दिव्यांगों की मेडिकल जांच के लिए लगने वाले कैंप की पिछले दिनों जगह बदल दी थी। यह कैंप नागरिक अस्पताल से दो किलोमीटर दूर सेक्टर-8 स्थित पॉलीक्लीनिक में लगाया जा रहा है। हर बुधवार को 200 से ज्यादा दिव्यांगों को जांच के लिए बुलाया जाता है। दिव्यांग मेडिकल करवाने के लिए सुबह नौ बजे ही कैंप में पहुंच जाते हैं। वहां कुछ चिकित्सक नौ से 12 बजे तक बैठते हैं और कुछ दोपहर बाद आते हैं। कौन पहले और कौन बाद में आता है उनके बारे में किसी को भी पता नहीं होता। 12 बजे आने वाले चिकित्सक दो बजे तक दिव्यांगों की जांच करते हैं। दो बजते ही चिकित्सक अपना केबिन छोड़कर चले जाते हैं और बाहर लाइन लगी रहती है। उनको बोला जाता है कि अगले बुधवार को आ जाना। ऐसे में बार-बार आने के बाद भी दिव्यांगों के मेडिकल प्रमाणपत्र नहीं बनाए जाते।
बिजली गुल होने पर अंधेरे में हुई जांच
बुधवार को भी पॉलीक्लीनिक में दिव्यांगों के लिए मेडिकल जांच कैंप लगा हुआ था। दोपहर 12 बजे बिजली चली गई। करीब एक घंटा से भी ज्यादा समय तक बिजली नहीं आई। ऐसे में अपनी बारी का इंतजार कर रहे दिव्यांग गर्मी सेपरेशान हो गए। दिव्यांग बिजली आने का इंतजार करते रहे और चिकित्सक कागजों तथा मेडिकल जांच अंधेरे में ही करते रहे।
500 लोगों के लिए एक वाटर कूलर, शौचालय बंद पड़े
पॉलीक्लीनिक में स्वास्थ्य विभाग ने एक कूलर लगाया हुआ है। हर बुधवार को उस वाटर कूलर का पानी खत्म हो जाता है क्योंकि बुधवार को दिव्यांगों समेत 500 से भी ज्यादा लोग यहां आते हैं। वह कूलर भी ऊंची जगह है, जहां से आम आदमी तो पानी पी सकता है लेकिन दिव्यांग व्यक्ति वहां तक नहीं पहुंच सकता। इसकी तरफ स्वास्थ्य विभाग का कोई ध्यान नहीं है। शौचालय के हालात भी बेहद दयनीय है, जहां पाइप टूटी पड़ी है और सफाई भी नहीं है। कभी कभार तो वह बिलकुल बंद मिलते हैं।
एक्सरे और फोटोस्टेट की नहीं सुविधा
दिव्यांगता बोर्ड में शामिल होने वाले लोगों को एक्सरे जरूर करवाना पड़ता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो बिना एक्सरे करवाए पहुंच जाते हैं। उनको दोबारा नागरिक अस्पताल में आकर एक्सरे करवाने पड़ते हैं। यदि किसी कागजात की फोटोस्टेट करवानी हो तो भी दो किलोमीटर आना पड़ता है। यह दोनों सुविधाएं पॉलीक्लीनिक में नहीं होने से दिव्यांगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
यूं बयां की परेशानी
एक हादसे में उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई थी। पिछले एक महीने से वह मेडिकल कैंप में आ रहा है, लेकिन चिकित्सक उसे हर बार अगले सप्ताह आने की बोल देते हैं। वह व्हील चेयर्र से उठ भी नहीं सकता। यदि किसी कागजात की कमी रही जाती है तो आसपास कोई फोटो स्टेट की भी दुकान नहीं है। एक प्रति के लिए दो किलोमीटर दूर शहर में आना पड़ता है।
-जगबीर, उचाना खुर्द
पोलियो ग्रस्त हूं। तीन-चार सप्ताह से वह कैंप के चक्कर का काट रहा हूं। कैंप में आने के लिए कोई वाहन तो मिलता नहीं है। वह हर बार अपने गांव से किराये पर ऑटो लेकर पहुंचता हूं। सुबह से लाइन में लगा हूं। अब तक तो नंबर नहीं आया। दो बजते ही चिकित्सक केबिन छोड़कर चले जाते हैं।
-जयपाल, बरसोला
-------
पेरालाइज हो गया था। उपचार लेने के बाद भी वह ठीक नहीं हो पाई। बिस्तर से उठने की भी स्थिति नहीं है। मेडिकल जांच करवाने के लिए बार-बार आ रही है लेकिन मेडिकल प्रमाण पत्र नहीं बन पाया। वह बार-बार चक्कर लगाकर थक चुकी हूं।
पॉलीक्लीनिक में फिलहाल कोई समस्या नहीं है। पीने के पानी से लेकर दिव्यांगों के बैठने तक की पूरी व्यवस्था है। डॉक्टर भी सभी की जांच के बाद ही वहां से निकलते हैं। कुछ लोगों के कागजातों में कोई कमी मिलती है या फिर उनको जांच के लिए बोला जाता है। इसी कारण उनको दोबारा बुलाया जाता है। दूरी को लेकर परेशानी है, जल्द ही इस बारे में भी कोई समाधान निकाला जाएगा।
-डॉ. मंजू कादियान, सिविल सर्जन