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मन को जीतने के लिए दृढ़ता जरूरी : अहिरका

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जींद। असमर्थ महिला कल्याण न्यास के संस्थापक पं. रामनिवास अहिरका के नेतृत्व में वीरवार को दादा खेड़ा पर हवन किया गया। इसमें श्रद्धालुओं ने आहुति देकर सुख-स्मृद्धि की कामना की। पं. रामनिवास अहिरका ने कहा कि वैराग्य होने पर राजा भर्तृहरि राज पाट को छोड़ मुनि वृत्ति से एक जंगल में परमात्मा का भजन करने लगे। एक दिन नगर में वे सत्संग सुन ने जा रहे थे कि रास्ते में एक दुकान पर हलवा बनता देख भर्तृहरि के मन मे हलवा खाने की तीव्र इच्छा पैदा हुई। राजा भर्तृहरि ने उसके मन को जितने के लिए उस दिन नगर में सत्संग सुनने की बजाए सारा दिन एक सड़क पर मिट्टी ढोने का काम किया। रात्रि होने पर भर्तृहरि ने मजदूरी के पैसों से उसी दुकान पर आकर हलवा खरीदा और पानी से भरे तालाब पर पहुंचा। भर्तृहरि हलवे का एक निवाला मुख्य की तरफ ले जाते और उसे तालाब में मछलियों के लिए डाल देते तथा अपने मुंह पर एक थप्पड़ मारते। इस तरह करते-करते भर्तृहरि ने सारा हलवा तालाब में मछलियों के लिए डाल दिया। तब जा कर भर्तृहरि के मन की उछाल कूद रुकी। इसके बाद भर्तृहरि ने भिक्षा मांगनी छोड़ कर काशी के शासन घाट पर आकर चिता के पास रखें आटे के गोलों से चिता की आग पर पकाई रोटियों खाकर परमात्मा का भजन करने लगे।
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