संवाद न्यूज एजेंसी
जींद। महर्षि दयानंद सरस्वती ने सती प्रथा समेत अन्य सामाजिक कुप्रथाओं का विरोध किया और लोगों में चेतना पैदा की। महर्षि दयानंद के विचारों को जन-जन तक फैलाना हमारा परम कर्तव्य है। ये बातें रविवार को महर्षि दयानंद योग चिकित्सा आश्रम में आयोजित मासिक वैदिक सत्संग में स्वामी रामवेश ने कहीं।
महर्षि दयानंद को अतुलनीय व्यक्तित्व बताते हुए उन्होंने कहा कि महर्षि पर अनेक बार घातक हमले हुए, जिनकी परवाह न करते हुए वह आगे बढ़ते रहे। महर्षि देश में विधवाओं का रुदन सहन नहीं कर पाए और जो लोग विधवाओं के लिए पुनर्विवाह का विरोध करते थे, उनको खुलेआम चुनौती दी। सती प्रथा का विरोध किया। महर्षि की प्रेरणा से कन्या गुरुकुल, आर्य स्कूल, आर्य कन्या काॅलेज और अनाथालय आदि खोले गए है। मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की गई और उसके बाद देश व विदेश में आर्य समाज की शाखाएं खुल गईं। 60 से ज्यादा देशों में आज भी आर्य समाज काम कर रहा है। ये स्वामी दयानंद की 200वीं जन्म जयंती वर्ष है। सभी आर्यजन इसको धूमधाम से मना रहे हैं। उन्होंने कहा कि महर्षि दयानंद के विचारों को जन-जन तक फैलाना हमारा परम कर्तव्य है।
पं. सुरेश चंद्र शास्त्री ने बताया कि संस्कार ही व्यक्ति को प्रतिष्ठा के स्थान पर आसीन करते हैं। जोरा सिंह योगाचार्य ने अष्टांग योग की संक्षिप्त व्याख्या की। बताया कि योग से ही मनुष्य के शरीर का सर्वांगीण विकास होता है। विद्यासागर शास्त्री ने कहा कि हमें प्रतिदिन यज्ञ करना चाहिए। ये ऐसा संभव न हो तो रविवार या पूर्णिमा व अमावस्या को यज्ञ अवश्य करना चाहिए। इस अवसर पर कैप्टन जोगिंद्र सिंह खटकड़, रणबीर आर्य, बलवान सिंह आर्य, राजेंद्र सिंह मलिक, शीला आर्या, बिमला आर्या, कर्ण सिंह आर्य, सूर्यदेव आर्य, पं. सुरेश चंद्र शास्त्री, योगेश्वर मुनि, जोरा सिंह आर्य मौजूद रहे।